Rigveda / 8 / 8 / 14
यन्ना॑सत्या परा॒वति॒ यद्वा॒ स्थो अध्यम्ब॑रे । अत॑: स॒हस्र॑निर्णिजा॒ रथे॒ना या॑तमश्विना ॥
Veda : Rigveda | Mandal : 8 | Sukta : 8 | Mantra No : 14
In English:
Seer : sadhva.mshaH kaaNvaH | Devta : ashvinau | Metre : nichRRidanuShTup | Tone : gaandhaaraH
Subject : English Translation will be uploaded as and when ready
Verse : yannaasatyaa paraavati yadvaa stho adhyambare . ataH sahasranirNijaa rathenaa yaatamashvinaa .
Component Words : yat . naasatyaa . paraa.avati . yat . vaa . sthaH . adhi . ambare . ataH . sahasra.anirnijaa . rathena . aa . yaatam . ashvinaa . 8.8.14
In Hindi:
ऋषि : सध्वंशः काण्वः | देवता : अश्विनौ | छन्द : निचृदनुष्टुप् | स्वर : गान्धारः
विषय :
पदपाठ : यत् । ना॒स॒त्या॒ । प॒रा॒ऽवति॑ । यत् । वा॒ । स्थः । अधि॑ । अम्ब॑रे । अतः॑ । स॒हस्र॑ऽनिर्निजा । रथे॑न । आ । या॒त॒म् । अ॒श्वि॒ना॒ ॥ ८.८.१४
पदार्थ : (नासत्या) हे सत्यवादिन् (यत्) यदि आप (परावति) दूरदेश में (यद्, वा) अथवा (अध्यम्बरे) अन्तरिक्षप्रदेश में (स्थः) हों (अश्विना) हे व्यापकशक्तिवाले ! (अतः) इन सब स्थानों से (सहस्रनिर्णिजा, रथेन) अनेकरूपवाले यान द्वारा (आयातम्) आवें ॥१४॥
भावार्थ : हे सत्यादि गुणसम्पन्न सभाध्यक्ष तथा सेनाध्यक्ष ! आप चाहे कहीं भी क्यों न हों, कृपा करके सब स्थानों से अपने विचित्र यान द्वारा हमारे यज्ञ में आकर सुशोभित हों और हमें विविध विद्याओं का उपदेश करें ॥१४ ॥
In Sanskrit:
ऋषि : सध्वंशः काण्वः | देवता : अश्विनौ | छन्द : निचृदनुष्टुप् | स्वर : गान्धारः
पदपाठ : यत् । ना॒स॒त्या॒ । प॒रा॒ऽवति॑ । यत् । वा॒ । स्थः । अधि॑ । अम्ब॑रे । अतः॑ । स॒हस्र॑ऽनिर्निजा । रथे॑न । आ । या॒त॒म् । अ॒श्वि॒ना॒ ॥ ८.८.१४
भावार्थ :