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Rigveda / 8 / 9 / 7

आ नू॒नम॒श्विनो॒ॠषि॒: स्तोमं॑ चिकेत वा॒मया॑ । आ सोमं॒ मधु॑मत्तमं घ॒र्मं सि॑ञ्चा॒दथ॑र्वणि ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 8 | Sukta : 9 | Mantra No : 7

In Hindi:

ऋषि : शशकर्णः काण्वः | देवता : अश्विनौ | छन्द : अनुष्टुप् | स्वर : गान्धारः

विषय :

पदपाठ : आ । नू॒नम् । अ॒श्विनोः॑ । ऋषिः॑ । स्तोम॑म् । चि॒के॒त॒ । वा॒मया॑ । आ । सोम॑म् । मधु॑मत्ऽतमम् । घ॒र्मम् । सि॒ञ्चा॒त् । अथ॑र्वणि ॥ ८.९.७

पदार्थ : (ऋषिः) विद्वान् पुरुष (अश्विनोः, स्तोमम्) उन सेनाध्यक्ष सभाध्यक्ष के स्तोत्रों को (वामया) अपनी तीक्ष्णबुद्धि से (नूनम्) निश्चय (आचिकेत) जाने (मधुमत्तमम्) अतिमधुर (धर्मम्, सोमम्) यज्ञीय सोमरस को (अथर्वणि) हिंसारहित यज्ञकर्मों में (आसिञ्चात्) आसिक्त=सिद्ध करे ॥७॥

भावार्थ : इस मन्त्र का भाव यह है कि सब नीतिज्ञ विद्वान् पुरुष क्षात्रबल=राजमर्यादा को भले प्रकार जानें, ताकि राजनियम के विरुद्ध चलकर दण्ड के भागी न हों और राजकीय पुरुषों का उत्तमोत्तम पदार्थों द्वारा सत्कार करें, जिससे वे सर्वत्र सत्कारार्ह सिद्ध हों ॥७ ॥