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Rigveda / 8 / 12 / 6

यो नो॑ दे॒वः प॑रा॒वत॑: सखित्व॒नाय॑ माम॒हे । दि॒वो न वृ॒ष्टिं प्र॒थय॑न्व॒वक्षि॑थ ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 8 | Sukta : 12 | Mantra No : 6

In Hindi:

ऋषि : पर्वतः काण्वः | देवता : इन्द्र: | छन्द : उष्णिक् | स्वर : ऋषभः

विषय :

पदपाठ : यः । नः॒ । दे॒वः । प॒रा॒ऽवतः॑ । स॒खि॒ऽत्व॒नाय॑ । म॒म॒हे । दि॒वः । न । वृ॒ष्टिम् । प्र॒थय॑न् । व॒वक्षि॑थ ॥ ८.१२.६

पदार्थ : (यः, देवः) जो दिव्यस्वरूप आप (नः, सखित्वनाय) हमारे प्रेम के कारण (परावतः) दूरदेश से (मामहे) इष्ट पदार्थों को देते हो (दिवः) द्युलोक से (वृष्टिम्) वृष्टि को (प्रथयन्, न) जैसे उत्पन्न करके देते हो (ववक्षिथ) और सबको धारण करते हो ॥६॥

भावार्थ : इस मन्त्र में परमात्मा की स्तुति का वर्णन करते हैं । हे परमपिता प्रभो ! हम आपके अत्यन्त कृतज्ञ हैं, आप हमारे पालन-पोषण के लिये इष्ट पदार्थों को दूरदेशों से प्राप्त कराते हैं । हे हमारे पालक पिता ! आप द्युलोक से वृष्टि वर्षाकर हमें अन्नादि अनेक पदार्थ देते हैं । हे परमात्मन् ! आप हमें बल दें कि हम कृतघ्न न होते हुए सदैव आपकी आज्ञापालन में प्रवृत्त रहें, जैसे लोक में सुपुत्र सदा अपने पिता की आज्ञापालन करते हैं ॥६ ॥