Rigveda / 8 / 12 / 11
गर्भो॑ य॒ज्ञस्य॑ देव॒युः क्रतुं॑ पुनीत आनु॒षक् । स्तोमै॒रिन्द्र॑स्य वावृधे॒ मिमी॑त॒ इत् ॥
Veda : Rigveda | Mandal : 8 | Sukta : 12 | Mantra No : 11
In English:
Seer : parvataH kaaNvaH | Devta : indra: | Metre : uShNik | Tone : RRIShabhaH
Subject : English Translation will be uploaded as and when ready
Verse : garbho yaj~nasya devayuH kratu.m puniita aanuShak . stomairindrasya vaavRRidhe mimiita it .
Component Words : garbhaH . yaj~nasya . deva.ayuH . kratum . puniite . aanuShak . stomaiH . indrasya . vavRRidhe . mimiite . it . 8.12.11
In Hindi:
ऋषि : पर्वतः काण्वः | देवता : इन्द्र: | छन्द : उष्णिक् | स्वर : ऋषभः
विषय :
पदपाठ : गर्भः॑ । य॒ज्ञस्य॑ । दे॒व॒ऽयुः । क्रतु॑म् । पु॒नी॒ते॒ । आ॒नु॒षक् । स्तोमैः॑ । इन्द्र॑स्य । व॒वृ॒धे॒ । मिमी॑ते । इत् ॥ ८.१२.११
पदार्थ : (यज्ञस्य, गर्भः) यज्ञ का संग्रह करनेवाला ऋत्विक् (देवयुः) देवों को चाहनेवाला (आनुषक्) क्रम से (क्रतुम्, पुनीते) सब यज्ञों का अनुष्ठान करता और (स्तोमैः) स्तोत्रों द्वारा (इन्द्रस्य, वावृधे) परमात्मा को बढ़ाता है, वह (मिमीते, इत्) परमात्मा को प्रकाशित ही करता है ॥११॥
भावार्थ : यज्ञ का प्रारम्भ करनेवाला ऋत्विक् सब विद्वानों की उपस्थिति में यज्ञ का अनुष्ठान करता हुआ स्तोत्रों द्वारा प्रथम परमात्मा का यजन करता अर्थात् परमात्मा की महिमा को सब पर प्रकट करके उसके महत्त्व को बढ़ाता और पश्चात् यज्ञ का प्रारम्भ करता है ॥११ ॥
In Sanskrit:
ऋषि : पर्वतः काण्वः | देवता : इन्द्र: | छन्द : उष्णिक् | स्वर : ऋषभः
पदपाठ : गर्भः॑ । य॒ज्ञस्य॑ । दे॒व॒ऽयुः । क्रतु॑म् । पु॒नी॒ते॒ । आ॒नु॒षक् । स्तोमैः॑ । इन्द्र॑स्य । व॒वृ॒धे॒ । मिमी॑ते । इत् ॥ ८.१२.११
भावार्थ :