Rigveda / 8 / 12 / 15
अ॒भि वह्न॑य ऊ॒तयेऽनू॑षत॒ प्रश॑स्तये । न दे॑व॒ विव्र॑ता॒ हरी॑ ऋ॒तस्य॒ यत् ॥
Veda : Rigveda | Mandal : 8 | Sukta : 12 | Mantra No : 15
In English:
Seer : parvataH kaaNvaH | Devta : indra: | Metre : nichRRiduShNik | Tone : RRIShabhaH
Subject : English Translation will be uploaded as and when ready
Verse : abhi vahnaya uutaye.anuuShata prashastaye . na deva vivrataa harii RRItasya yat .
Component Words : abhi . vahnayaH . uutaye . anuuShata . pra.ashastaye . na . deva . vi.avrataa . harii iti . RRItasya . yat . 8.12.15
In Hindi:
ऋषि : पर्वतः काण्वः | देवता : इन्द्र: | छन्द : निचृदुष्णिक् | स्वर : ऋषभः
विषय :
पदपाठ : अ॒भि । वह्न॑यः । ऊ॒तये॑ । अनू॑षत । प्रऽश॑स्तये । न । दे॒व॒ । विऽव्र॑ता । हरी॒ इति॑ । ऋ॒तस्य॑ । यत् ॥ ८.१२.१५
पदार्थ : (वह्नयः) वह्निसदृश विद्वान् (प्रशस्तये) प्रशस्य (ऊतये) रक्षा के लिये (अभ्यनूषत) आपकी अभितः स्तुति करते हैं (देव) हे दिव्यस्वरूप ! (विव्रता) विविधकर्मवाली आपकी (हरी) पालन-संहाररूप शक्तियें हैं, (यत्) जो (ऋतस्य) सत्यस्वरूप आपका प्रकाश करती हैं ॥१५॥
भावार्थ : हे सत्यस्वरूप, हे सबका पालन, पोषण तथा संहार करनेवाले परमात्मन् ! अग्निसदृश देदीप्यमान विद्वान् स्तुतियों द्वारा आपका प्रकाश करते अर्थात् प्रजाओं को आपकी ओर आकर्षित करते हैं कि परमात्मा की उपर्युक्त महान् शक्तियों को अनुभव करते हुए उसी की उपासना करो, अन्य की नहीं ॥१५ ॥
In Sanskrit:
ऋषि : पर्वतः काण्वः | देवता : इन्द्र: | छन्द : निचृदुष्णिक् | स्वर : ऋषभः
पदपाठ : अ॒भि । वह्न॑यः । ऊ॒तये॑ । अनू॑षत । प्रऽश॑स्तये । न । दे॒व॒ । विऽव्र॑ता । हरी॒ इति॑ । ऋ॒तस्य॑ । यत् ॥ ८.१२.१५
भावार्थ :