Rigveda / 8 / 12 / 32
यद॑स्य॒ धाम॑नि प्रि॒ये स॑मीची॒नासो॒ अस्व॑रन् । नाभा॑ य॒ज्ञस्य॑ दो॒हना॒ प्राध्व॒रे ॥
Veda : Rigveda | Mandal : 8 | Sukta : 12 | Mantra No : 32
In English:
Seer : parvataH kaaNvaH | Devta : indra: | Metre : nichRRiduShNik | Tone : RRIShabhaH
Subject : English Translation will be uploaded as and when ready
Verse : yadasya dhaamani priye samiichiinaaso asvaran . naabhaa yaj~nasya dohanaa praadhvare .
Component Words : yat . asya . dhaamani . priye . samiichiinaasaH . asvaran . naabhaa . yaj~nasya . dohanaa . pra . adhvare . 8.12.32
In Hindi:
ऋषि : पर्वतः काण्वः | देवता : इन्द्र: | छन्द : निचृदुष्णिक् | स्वर : ऋषभः
विषय :
पदपाठ : यत् । अ॒स्य॒ । धाम॑नि । प्रि॒ये । स॒मी॒ची॒नासः॑ । अस्व॑रन् । नाभा॑ । य॒ज्ञस्य॑ । दो॒हना॑ । प्र । अ॒ध्व॒रे ॥ ८.१२.३२
पदार्थ : (यत्) जो (यज्ञस्य, अस्य) यज्ञरूप इस परमात्मा के (दोहना, प्राध्वरे) पदार्थों के दुहनेवाले महायज्ञ में (प्रिये, नाभा, धामनि) प्रिय नाभिरूप द्युलोक में (समीचीनासः) द्योतमान विविध लोक (अस्वरन्) शब्दायमान हो रहे हैं, वह इसकी महिमा है ॥३२॥
भावार्थ : “यज्ञो वै विष्णुः” इत्यादि वाक्यों से यज्ञ नाम व्यापक परमात्मा का है और “नाभ्या आसीदन्तरिक्षम्” इस मन्त्र के अनुसार अन्तरिक्ष उस परमात्मा का नाभिस्थान माना गया है । उसी नाभि=द्युलोक में अनेक लोक उस परमात्मा की शक्ति से भ्रमण करते हुए शब्दायमान हो रहे हैं और उसी के तेज से उनमें अनेक स्वयंप्रकाश हैं, यह उस परमात्मा की महिमा है ॥३२ ॥
In Sanskrit:
ऋषि : पर्वतः काण्वः | देवता : इन्द्र: | छन्द : निचृदुष्णिक् | स्वर : ऋषभः
पदपाठ : यत् । अ॒स्य॒ । धाम॑नि । प्रि॒ये । स॒मी॒ची॒नासः॑ । अस्व॑रन् । नाभा॑ । य॒ज्ञस्य॑ । दो॒हना॑ । प्र । अ॒ध्व॒रे ॥ ८.१२.३२
भावार्थ :