Rigveda / 8 / 13 / 8
क्रीळ॑न्त्यस्य सू॒नृता॒ आपो॒ न प्र॒वता॑ य॒तीः । अ॒या धि॒या य उ॒च्यते॒ पति॑र्दि॒वः ॥
Veda : Rigveda | Mandal : 8 | Sukta : 13 | Mantra No : 8
In English:
Seer : naaradaH kaaNvaH | Devta : indra: | Metre : nichRRiduShNik | Tone : RRIShabhaH
Subject : English Translation will be uploaded as and when ready
Verse : kriiLantyasya suunRRitaa aapo na pravataa yatiiH . ayaa dhiyaa ya uchyate patirdivaH .
Component Words : kriiLanti . asya . suunRRitaaH . aapaH . na . pra.avataa . yatiiH . ayaa . dhiyaa . yaH . uchyate . patiH . divaH . 8.13.8
In Hindi:
ऋषि : नारदः काण्वः | देवता : इन्द्र: | छन्द : निचृदुष्णिक् | स्वर : ऋषभः
विषय :
पदपाठ : क्रीळ॑न्ति । अ॒स्य॒ । सू॒नृताः॑ । आपः॑ । न । प्र॒ऽवता॑ । य॒तीः । अ॒या । धि॒या । यः । उ॒च्यते॑ । पतिः॑ । दि॒वः ॥ ८.१३.८
पदार्थ : (यः) जो परमात्मा (अया, धिया) इस स्तुति द्वारा (दिवः, पतिः) द्युलोक का स्वामी (उच्यते) कहा जाता है (प्रवता) निम्नमार्ग से (यतीः) जानेवाले (आपः) जलों के (न) समान (अस्य, सूनृताः) इसकी प्रियसत्य वाणियें (क्रीळन्ति) विहर रही हैं ॥८॥
भावार्थ : वह पूर्ण परमात्मा, जो द्युलोकादि लोक-लोकान्तरों का स्वामी तथा रक्षक है, उसकी वेदरूप वाणियें अनायास सर्वत्र विस्तृत हो रही है । जैसे जल स्वाभाविक अनायास ही निम्न स्थानों को प्राप्त होता है, इसी प्रकार वेदरूप प्रिय सत्य वाणियें मनुष्यमात्र को प्राप्त होने से सबके अनुष्ठानयोग्य हैं ॥८ ॥
In Sanskrit:
ऋषि : नारदः काण्वः | देवता : इन्द्र: | छन्द : निचृदुष्णिक् | स्वर : ऋषभः
पदपाठ : क्रीळ॑न्ति । अ॒स्य॒ । सू॒नृताः॑ । आपः॑ । न । प्र॒ऽवता॑ । य॒तीः । अ॒या । धि॒या । यः । उ॒च्यते॑ । पतिः॑ । दि॒वः ॥ ८.१३.८
भावार्थ :