Rigveda / 8 / 13 / 10
स्तु॒हि श्रु॒तं वि॑प॒श्चितं॒ हरी॒ यस्य॑ प्रस॒क्षिणा॑ । गन्ता॑रा दा॒शुषो॑ गृ॒हं न॑म॒स्विन॑: ॥
Veda : Rigveda | Mandal : 8 | Sukta : 13 | Mantra No : 10
In English:
Seer : naaradaH kaaNvaH | Devta : indra: | Metre : uShNik | Tone : RRIShabhaH
Subject : English Translation will be uploaded as and when ready
Verse : stuhi shruta.m vipashchita.m harii yasya prasakShiNaa . gantaaraa daashuSho gRRiha.m namasvinaH .
Component Words : stuhi . shrutam . vipaH.achitam . harii iti . yasya . pra.asakShiNaa . gantaaraa . daashuShaH . gRRiham . namasvinaH . 8.13.10
In Hindi:
ऋषि : नारदः काण्वः | देवता : इन्द्र: | छन्द : उष्णिक् | स्वर : ऋषभः
विषय :
पदपाठ : स्तु॒हि । श्रु॒तम् । वि॒पः॒ऽचित॑म् । हरी॒ इति॑ । यस्य॑ । प्र॒ऽस॒क्षिणा॑ । गन्ता॑रा । दा॒शुषः॑ । गृ॒हम् । न॒म॒स्विनः॑ ॥ ८.१३.१०
पदार्थ : हे उपासक ! (श्रुतम्) प्रसिद्ध (विपश्चितम्) उस विद्वान् परमात्मा की (स्तुहि) स्तुति करो (यस्य, हरी) जिसकी उत्पादन-रक्षणरूप शक्तियें (प्रसक्षिणा) शत्रु को नम्र करनेवाली और (नमस्विनः) नम्र (दाशुषः) उपासक के (गृहे) अन्तःकरणरूप गृह में (गन्तारा) जानेवाली हैं ॥१०॥
भावार्थ : हे उपासक जनो ! तुम उस परमात्मा की उपासना में निरन्तर प्रवृत्त रहो, जिसकी उत्पादन तथा रक्षणरूप शक्तियें शत्रुओं को वशीभूत करनेवाली और उपासक के अन्तःकरण में प्रविष्ट होकर उसको बलवान् तथा पवित्र भावोंवाला बनानेवाली हैं ॥१० ॥
In Sanskrit:
ऋषि : नारदः काण्वः | देवता : इन्द्र: | छन्द : उष्णिक् | स्वर : ऋषभः
पदपाठ : स्तु॒हि । श्रु॒तम् । वि॒पः॒ऽचित॑म् । हरी॒ इति॑ । यस्य॑ । प्र॒ऽस॒क्षिणा॑ । गन्ता॑रा । दा॒शुषः॑ । गृ॒हम् । न॒म॒स्विनः॑ ॥ ८.१३.१०
भावार्थ :