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Rigveda / 1 / 151 / 8

यु॒वां य॒ज्ञैः प्र॑थ॒मा गोभि॑रञ्जत॒ ऋता॑वाना॒ मन॑सो॒ न प्रयु॑क्तिषु। भर॑न्ति वां॒ मन्म॑ना सं॒यता॒ गिरोऽदृ॑प्यता॒ मन॑सा रे॒वदा॑शाथे ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 1 | Sukta : 151 | Mantra No : 8

In Hindi:

ऋषि : दीर्घतमा औचथ्यः | देवता : मित्रावरुणौ | छन्द : निचृज्जगती | स्वर : निषादः

विषय : फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ।

पदपाठ : यु॒वाम्। य॒ज्ञैः। प्र॒थ॒मा। गोभिः॑। अ॒ञ्ज॒ते॒। ऋत॑ऽवाना। मन॑सः। न। प्रऽयु॑क्तिषु। भर॑न्ति। वा॒म्। मन्म॑ना। स॒म्ऽयता॑। गिरः॑। अदृ॑प्यता। मन॑सा। रे॒वत्। आ॒शा॒थे॒ इति॑ ॥ १.१५१.८

पदार्थ : हे अध्यापकोपदेशक सज्जनो ! जो (यज्ञैः) यज्ञों से (गोभिः) और सुन्दर शिक्षित वाणियों से (अञ्जते) कामना करते हैं (ऋतावाना) और सत्य आचरण का सम्बन्ध रखनेवाले (प्रथमा) आदि में होनेवाले (युवाम्) तुम दोनों को (मनसः) अन्तःकरण के (प्रयुक्तिषु) प्रयोगों को उल्लासों में जैसे (न) वैसे व्यवहारों में (भरन्ति) पुष्ट करते हैं तथा (वाम्) तुम दोनों की शिक्षाओं को पाकर (संयता) संयम युक्त (अदृप्यता) हर्ष-मोहरहित (मन्मना) विज्ञानरूप (मनसा) मन से (गिरः) वाणियों और (रेवत्) बहुत धनों से भरे हुए ऐश्वर्य को (भरन्ति) पुष्ट करते हैं और तुमको (आशाथे) प्राप्त होते हैं, उनको तुम नित्य पढ़ाओ और सिखाओ ॥ ८ ॥

भावार्थ : इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। हे विद्वानो ! जो तुमको विद्या प्राप्ति के लिये श्रद्धा से प्राप्त होवें और जो जितेन्द्रिय, धार्मिक हों, उन सभों को अच्छे यत्न के साथ विद्यावान् और धार्मिक करो ॥ ८ ॥