Donation Appeal Download Our App
Choose Mantra
Rigveda / 8 / 13 / 15

यच्छ॒क्रासि॑ परा॒वति॒ यद॑र्वा॒वति॑ वृत्रहन् । यद्वा॑ समु॒द्रे अन्ध॑सोऽवि॒तेद॑सि ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 8 | Sukta : 13 | Mantra No : 15

In Hindi:

ऋषि : नारदः काण्वः | देवता : इन्द्र: | छन्द : उष्णिक् | स्वर : ऋषभः

विषय :

पदपाठ : यत् । श॒क्र॒ । असि॑ । प॒रा॒ऽवति॑ । यत् । अ॒र्वा॒ऽवति॑ । वृ॒त्र॒ऽह॒न् । यत् । वा॒ । स॒मु॒द्रे । अन्ध॑सः । अ॒वि॒ता । इत् । अ॒सि॒ ॥ ८.१३.१५

पदार्थ : (शक्र) हे समर्थ (वृत्रहन्) आवरणनाशक परमात्मन् ! (यत्, परावति, असि) चाहें आप दूर हैं (यत्, अर्वावति) चाहें समीप हों (यद्, वा, समुद्रे) चाहे अन्तरिक्ष में हों, सर्वस्थानों से (अन्धसः) भोग्य पदार्थों के (अविता, इत्, असि) रक्षक ही हैं ॥१५॥

भावार्थ : हे आवरण=अविद्यानाशक परमात्मन् ! आप सर्वत्र सबको यथाभाग भोग्य पदार्थों का दान देते हुए अपनी व्यापकता से सबको नियम में रखते और सदैव सबकी रक्षा करते हैं । हे प्रभो ! अपने दिये हुए पदार्थों तथा सन्तानों की आप ही रक्षा करें, ताकि आपका दिया हुआ ऐश्वर्य्य हमसे वियुक्त न हो, क्योंकि आप सब प्रकार से समर्थ हैं ॥१५ ॥