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Rigveda / 8 / 13 / 29

इ॒मा अ॑स्य॒ प्रतू॑र्तयः प॒दं जु॑षन्त॒ यद्दि॒वि । नाभा॑ य॒ज्ञस्य॒ सं द॑धु॒र्यथा॑ वि॒दे ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 8 | Sukta : 13 | Mantra No : 29

In Hindi:

ऋषि : नारदः काण्वः | देवता : इन्द्र: | छन्द : उष्णिक् | स्वर : ऋषभः

विषय :

पदपाठ : इ॒माः । अ॒स्य॒ । प्रऽतू॑र्तयः । प॒दम् । जु॒ष॒न्त॒ । यत् । दि॒वि । नाभा॑ । य॒ज्ञस्य॑ । सम् । द॒धुः॒ । यथा॑ । वि॒दे ॥ ८.१३.२९

पदार्थ : (अस्य) इस परमात्मा की (इमाः, प्रतूर्तयः) ये हिंसनशक्तियें (यत्) जो (दिवि, पदम्, जुषन्त) द्युलोक में स्थान को प्राप्त किये हुए हैं अतः (यथा, विदे) यथावत् ज्ञान के लिये (यज्ञस्य, नाभा) राज्य ब्रह्माण्ड की बन्धनशक्ति में (सन्दधुः) सबको धारण करती हैं ॥२९॥

भावार्थ : इस मन्त्र का भाव यह है कि यह परमात्मा की अपूर्व सीमा है कि जिसकी शक्ति से अनेक ब्रह्माण्ड किसी अन्य के आश्रय की अपेक्षा न करते हुए निराधार स्थिर है, जैसे सूर्य्य, चन्द्रमा, नक्षत्र आदि अनेक पदार्थ रचकर उनमें गति प्रवेश करके काल आदि विशेष ज्ञान के लिये धारण कर रहा है, जो उसकी महिमा को भले प्रकार प्रकट करते हैं ॥२९ ॥