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Rigveda / 8 / 17 / 13

यस्ते॑ शृङ्गवृषो नपा॒त्प्रण॑पात्कुण्ड॒पाय्य॑: । न्य॑स्मिन्दध्र॒ आ मन॑: ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 8 | Sukta : 17 | Mantra No : 13

In Hindi:

ऋषि : इरिम्बिठिः काण्वः | देवता : इन्द्र: | छन्द : विराड्गायत्री | स्वर : षड्जः

विषय :

पदपाठ : यः । ते॒ । शृ॒ङ्ग॒ऽवृ॒षः॒ । न॒पा॒त् । प्रन॑पा॒द् इति॒ प्रऽन॑पात् । कु॒ण्ड॒ऽपाय्यः॑ । नि । अ॒स्मि॒न् । द॒ध्रे॒ । आ । मनः॑ ॥ ८.१७.१३

पदार्थ : (शृङ्गवृषः, नपात्) हे स्वतेजोवर्धक उपासक के रक्षक योद्धा ! (यः, ते) जो आपका (प्रणपात्) प्ररक्षक (कुण्डपाय्यः) यज्ञविशेष है (अस्मिन्) इस कुण्डपाय्य नामक यज्ञ में (मनः) उपासक जन मन को (न्यादध्रे) लगाते हैं ॥१३॥

भावार्थ : हे उपासकों के रक्षक तेजस्वी योद्धा ! आपका रक्षक जो “कुण्डपाय्य” यज्ञ* है, उस यज्ञ को याज्ञिक पुरुष बड़ी श्रद्धा तथा उत्साह से पूर्ण करते हैं, जिससे आपका बल वृद्धि को प्राप्त हो, आप सदा अजय हों अर्थात् कोई शत्रु आपको युद्ध में न जीत सके ॥१३ ॥ *कुण्ड के आकारविशेषवाले पात्रों से जिस यज्ञ में सोमपान किया जाता है, उसका नाम “कुण्डपाय्य” यज्ञ है ॥