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Rigveda / 8 / 18 / 21

अ॒ने॒हो मि॑त्रार्यमन्नृ॒वद्व॑रुण॒ शंस्य॑म् । त्रि॒वरू॑थं मरुतो यन्त नश्छ॒र्दिः ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 8 | Sukta : 18 | Mantra No : 21

In Hindi:

ऋषि : इरिम्बिठिः काण्वः | देवता : आदित्याः | छन्द : विराडुष्निक् | स्वर : ऋषभः

विषय :

पदपाठ : अ॒ने॒हः । मि॒त्र॒ । अ॒र्य॒म॒न् । नृ॒ऽवत् । व॒रु॒ण॒ । शंस्य॑म् । त्रि॒ऽवरू॑थम् । म॒रु॒तः॒ । य॒न्त॒ । नः॒ । छ॒र्दिः ॥ ८.१८.२१

पदार्थ : (मित्र) हे सब प्रजाओं के मित्रभूत नेता (अर्यमन्) हे ईश्वरज्ञान में तत्पर नेता (वरुण) हे विघ्ननिवारण में तत्पर नेता (मरुतः) हे योद्धाओं के अधिपति नेता ! (नः) आप सब हमारे लिये (अनेहः) हिंसकवर्जित (नृवत्) मनुष्यों से भरे हुए (शंस्यम्) सब मनुष्यों से प्रशंसा करने योग्य (त्रिवरूथम्) विविध कार्यसाधन के लिये तीन स्थानों में विभक्त (छर्दिः) गृह को (यन्त) दें ॥२१॥

भावार्थ : हे सब प्रजाओं को मित्रता की दृष्टि से देखनेवाले, वेदविहित कर्मों में तत्पर रहनेवाले, प्रजाओं के दुःखनिवारण करने में तत्पर रहनेवाले और योद्धाओं के अधिपति=वेदविद्यासम्पन्न विद्वान् पुरुष, परोपकारपरायण नेता पुरुष, प्रशंसनीय अहिंसक पुरुषों से भरे हुए अर्थात् वेदविहित कर्म करनेवाले परिवार से परिपूर्ण उत्तम गृह प्रदान करें ॥२१ ॥