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Rigveda / 1 / 153 / 2

प्रस्तु॑तिर्वां॒ धाम॒ न प्रयु॑क्ति॒रया॑मि मित्रावरुणा सुवृ॒क्तिः। अ॒नक्ति॒ यद्वां॑ वि॒दथे॑षु॒ होता॑ सु॒म्नं वां॑ सू॒रिर्वृ॑षणा॒विय॑क्षन् ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 1 | Sukta : 153 | Mantra No : 2

In Hindi:

ऋषि : दीर्घतमा औचथ्यः | देवता : मित्रावरुणौ | छन्द : निचृत्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।

पदपाठ : प्रऽस्तु॑तिः। वा॒म्। धाम॑। न। प्रऽयु॑क्तिः। अया॑मि। मि॒त्रा॒व॒रु॒णा॒। सु॒ऽवृ॒क्तिः। अ॒नक्ति॑। यत्। वा॒म्। वि॒दथे॑षु। होता॑। सु॒म्नम्। वा॒म्। सू॒रिः। वृ॒ष॒णौ॒। इय॑क्षन् ॥ १.१५३.२

पदार्थ : हे (वृषणौ) सुख वृष्टि करनेहारे (मित्रावरुणा) मित्र और श्रेष्ठ जन (इयक्षन्) प्राप्त होने की इच्छा करता हुआ (सूरिः) विद्वान् (सुवृक्तिः) जिसका सुन्दर रोकना (प्रस्तुतिः) और उत्तम स्तुति (होता) वह ग्रहण करनेवाला (प्रयुक्तिः) उत्तम युक्ति में (धाम) स्थान के (न) समान (वाम्) तुम दोनों को (अयामि) प्राप्त होता हूँ। वा (यत्) जो विद्वान् (वाम्) तुम दोनों से (विदथेषु) विज्ञानों में (अनक्ति) कामना करता है वा (वाम्) तुम दोनों के लिये (सुम्नम्) सुख देता है, उसको मैं प्राप्त होता हूँ ॥ २ ॥

भावार्थ : इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जो मनुष्य पाप हरने और प्रशंसित गुणों को ग्रहण करनेवाले, जिनको विद्वानों का सङ्ग प्यारा है और सबके लिये सुख देनेवाले होते हैं, वे कल्याण सेवनेवाले होते हैं ॥ २ ॥