Rigveda / 8 / 19 / 3
यजि॑ष्ठं त्वा ववृमहे दे॒वं दे॑व॒त्रा होता॑र॒मम॑र्त्यम् । अ॒स्य य॒ज्ञस्य॑ सु॒क्रतु॑म् ॥
Veda : Rigveda | Mandal : 8 | Sukta : 19 | Mantra No : 3
In English:
Seer : sobhariH kaaNvaH | Devta : agniH | Metre : nichRRiduShNik | Tone : RRIShabhaH
Subject : English Translation will be uploaded as and when ready
Verse : yajiShTha.m tvaa vavRRimahe deva.m devatraa hotaaramamartyam . asya yaj~nasya sukratum .
Component Words : yajiShTham . tvaa . vavRRimahe . devam . deva.atraa . hotaaram . amartyam . asya . yaj~nasya . su.akratum . 8.19.3
In Hindi:
ऋषि : सोभरिः काण्वः | देवता : अग्निः | छन्द : निचृदुष्णिक् | स्वर : ऋषभः
विषय :
पदपाठ : यजि॑ष्ठम् । त्वा॒ । व॒वृ॒म॒हे॒ । दे॒वम् । दे॒व॒ऽत्रा । होता॑रम् । अम॑र्त्यम् । अ॒स्य । य॒ज्ञस्य॑ । सु॒ऽक्रतु॑म् ॥ ८.१९.३
पदार्थ : हे परमात्मन् ! (यजिष्ठम्) अत्यन्त पूजनीय (देवत्रा, देवम्) देवों में भी देव (होतारम्) यज्ञप्रेरक (अमर्त्यम्) मृत्युरहित, विकाररहित (अस्य, यज्ञस्य, क्रतुम्) इस ब्रह्माण्डरूप यज्ञ के करनेवाले (त्वा) आपको (ववृमहे) वरण करते हैं ॥३॥
भावार्थ : पूर्व मन्त्र में परमात्मा को स्तुति द्वारा वरण करना वर्णन किया है, अब इस मन्त्र में वरण का हेतु दिखलाया है कि जो परमात्मा सबसे बड़े इस ब्रह्माण्डरूप यज्ञ का प्रवर्तक तथा स्थितिकर्ता है और मृत्युरहित होने से सर्वदा सहायक है तथा सब देवों का भी देवता है, उसीका रक्षार्थ वरण करना उचित है, क्योंकि अन्य साधारणजन अधिक से अधिक एक जन्म का सहायक हो सकता है और वह अनेक जन्म-जन्मान्तरों का सहायक है, अतएव मनुष्य मात्र उसी का वरण कर उसी की स्तुति तथा उपासना में तत्पर हों ॥३ ॥
In Sanskrit:
ऋषि : सोभरिः काण्वः | देवता : अग्निः | छन्द : निचृदुष्णिक् | स्वर : ऋषभः
पदपाठ : यजि॑ष्ठम् । त्वा॒ । व॒वृ॒म॒हे॒ । दे॒वम् । दे॒व॒ऽत्रा । होता॑रम् । अम॑र्त्यम् । अ॒स्य । य॒ज्ञस्य॑ । सु॒ऽक्रतु॑म् ॥ ८.१९.३
भावार्थ :