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Rigveda / 8 / 19 / 15

तद॑ग्ने द्यु॒म्नमा भ॑र॒ यत्सा॒सह॒त्सद॑ने॒ कं चि॑द॒त्रिण॑म् । म॒न्युं जन॑स्य दू॒ढ्य॑: ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 8 | Sukta : 19 | Mantra No : 15

In Hindi:

ऋषि : सोभरिः काण्वः | देवता : अग्निः | छन्द : निचृदुष्णिक् | स्वर : ऋषभः

विषय : अब क्रोध न करनेवाले को फल कथन करते हैं।

पदपाठ : तत् । अ॒ग्ने॒ । द्यु॒म्नम् । आ । भ॒र॒ । यत् । स॒सह॑त् । सद॑ने । कम् । चि॒त् । अ॒त्रिण॑म् । म॒न्युम् । जन॑स्य । दुः॒ऽध्यः॑ ॥ ८.१९.१५

पदार्थ : (अग्ने) हे परमात्मन् ! (तद्, द्युम्नम्) आप उस पराक्रम को (आभर) मुझे आहरण करें (यत्) जो (सदने) गृह में वर्तमान (कंचित्, अत्रिणम्) किसी भी सतानेवाले राक्षस को और (दूढ्यः, जनस्य) मूर्ख मनुष्य के (मन्युम्) अनुचित क्रोध को (सासहत्) अभिभूत कर सके ॥१५॥

भावार्थ : प्रत्येक उपासक को चाहिये कि वह परमात्मोपासना द्वारा स्वशक्ति बढ़ाकर अनुचित व्यापार से स्वकार्यबाधित करनेवालों को ही बाधित करें, अपराधरहित प्राणी को कदापि नहीं, क्योंकि निरपराध प्राणी को बाधित करना असुरभाव कहलाता है, अतएव पुरुष असुरभाव का कदापि अवलम्बन न करे और किसी प्राणी पर कदापि अनुचित क्रोध न करे, ऐसा पुरुष सदैव विपत्तिग्रस्त रहता और अक्रोधी पुरुष सबका मित्र होता और उसका जीवन संसार में सुखमय होता है ॥१५ ॥