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Rigveda / 8 / 19 / 19

भ॒द्रो नो॑ अ॒ग्निराहु॑तो भ॒द्रा रा॒तिः सु॑भग भ॒द्रो अ॑ध्व॒रः । भ॒द्रा उ॒त प्रश॑स्तयः ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 8 | Sukta : 19 | Mantra No : 19

In Hindi:

ऋषि : सोभरिः काण्वः | देवता : अग्निः | छन्द : ककुबुष्णिक् | स्वर : ऋषभः

विषय :

पदपाठ : भ॒द्रः । नः॒ । अ॒ग्निः । आऽहु॑तः । भ॒द्रा । रा॒तिः । सु॒ऽभ॒ग॒ । भ॒द्रः । अ॒ध्व॒रः । भ॒द्राः । उ॒त । प्रऽश॑स्तयः ॥ ८.१९.१९

पदार्थ : (सुभग) हे सुन्दर ऐश्वर्य्यवाले परमात्मन् ! (आहुतः, अग्निः) आहुति द्वारा सेवित आप (नः, भद्रः) हमारे कल्याणकारी हो (भद्रा, रातिः) हमारा दान कल्याणमय हो (भद्रः, अध्वरः) हमारा हिंसारहित याग भी कल्याणमय हो और (उत, प्रशस्तयः) हमारी स्तुतिएँ भी (भद्राः) कल्याणजनक हों ॥१९॥

भावार्थ : इस मन्त्र में यह उपदेश किया है कि आहुति आदि मन्त्रोक्त कर्मों के आदि में याज्ञिक प्रार्थना करें कि हमारे यज्ञ में दान आदि कोई ऐसा कर्म न हो, जिससे किसी जीव को कष्ट हो, किन्तु सब कर्म सब जीवों के हितकारक हों अर्थात् हमारा यज्ञ हिंसारहित हो और हमारी स्तुतिएँ कल्याणकारक हों, जिससे सब प्राणी सुख अनुभव करें ॥१९ ॥