Rigveda / 8 / 19 / 31
तव॑ द्र॒प्सो नील॑वान्वा॒श ऋ॒त्विय॒ इन्धा॑नः सिष्ण॒वा द॑दे । त्वं म॑ही॒नामु॒षसा॑मसि प्रि॒यः क्ष॒पो वस्तु॑षु राजसि ॥
Veda : Rigveda | Mandal : 8 | Sukta : 19 | Mantra No : 31
In English:
Seer : sobhariH kaaNvaH | Devta : agniH | Metre : nichRRitpa~Nkti | Tone : pa~nchamaH
Subject : English Translation will be uploaded as and when ready
Verse : tava drapso niilavaanvaasha RRItviya indhaanaH siShNavaa dade . tva.m mahiinaamuShasaamasi priyaH kShapo vastuShu raajasi .
Component Words : tava . drapsaH . niila.avaan . vaashaH . RRItviyaH . indhaanaH . siShNo iti . aa . dade . tvam . mahiinaam . uShasaam . asi . priyaH . kShapaH . vastuShu . raajasi . 8.19.31
In Hindi:
ऋषि : सोभरिः काण्वः | देवता : अग्निः | छन्द : निचृत्पङ्क्ति | स्वर : पञ्चमः
विषय :
पदपाठ : तव॑ । द्र॒प्सः । नील॑ऽवान् । वा॒शः । ऋ॒त्वियः॑ । इन्धा॑नः । सि॒ष्णो॒ इति॑ । आ । द॒दे॒ । त्वम् । म॒ही॒नाम् । उ॒षसा॑म् । अ॒सि॒ । प्रि॒यः । क्ष॒पः । वस्तु॑षु । रा॒ज॒सि॒ ॥ ८.१९.३१
पदार्थ : (द्रप्सः) द्रवणशील (नीलवान्) अत्युत्तम आधारवाला (वाशः) कमनीय (ऋत्वियः) प्रतिऋतु में उत्पाद्य (इन्धानः) दीप्तिमान् (तव) आपका रस (सिष्णो) हे कामप्रद ! (आददे) यज्ञों में ग्रहण किया जाता है (त्वम्, महीनाम्, उषसाम्) आप सब उषाकालों में (प्रियः, असि) तृप्तिकर हैं (वस्तुषु) सब वस्तुओं में (क्षपः) रसरूप से (राजसि) प्रकाशमान हो रहे हैं ॥३१॥
भावार्थ : जिस परमात्मा के ब्रह्मानन्द की समता कोई आनन्द नहीं कर सकता और जो शक्तिरूपेण प्रत्येक वस्तु में प्रकाशित हो रहा है, उसका प्रत्येक उषाकल में गान करना प्रत्येक मनुष्य को उचित है ॥३१ ॥
In Sanskrit:
ऋषि : सोभरिः काण्वः | देवता : अग्निः | छन्द : निचृत्पङ्क्ति | स्वर : पञ्चमः
पदपाठ : तव॑ । द्र॒प्सः । नील॑ऽवान् । वा॒शः । ऋ॒त्वियः॑ । इन्धा॑नः । सि॒ष्णो॒ इति॑ । आ । द॒दे॒ । त्वम् । म॒ही॒नाम् । उ॒षसा॑म् । अ॒सि॒ । प्रि॒यः । क्ष॒पः । वस्तु॑षु । रा॒ज॒सि॒ ॥ ८.१९.३१
भावार्थ :