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Rigveda / 8 / 19 / 34

यमा॑दित्यासो अद्रुहः पा॒रं नय॑थ॒ मर्त्य॑म् । म॒घोनां॒ विश्वे॑षां सुदानवः ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 8 | Sukta : 19 | Mantra No : 34

In Hindi:

ऋषि : सोभरिः काण्वः | देवता : आदित्याः | छन्द : पादनिचृदुष्णिक् | स्वर : ऋषभः

विषय :

पदपाठ : यम् । आ॒दि॒त्या॒सः॒ । अ॒द्रु॒हः॒ । पा॒रम् । नय॑थ । मर्त्य॑म् । म॒घोना॑म् । विश्वे॑षाम् । सु॒ऽदा॒न॒वः॒ ॥ ८.१९.३४

पदार्थ : (अद्रुहः, आदित्यासः) हे किसी पर द्रोह न करनेवाले अदिति=दैत्यरहित विद्या के पुत्र सदृश विद्वानों ! (सुदानवः) सुन्दर दानवाले आप (यम्, मर्त्यम्) जिस मनुष्य को (पारम्, नयथ) विद्या के पार कर देते हैं, वह (विश्वेषाम्, मघोनाम्) सब धनिकों में श्रेष्ठ होता है ॥३४॥

भावार्थ : विद्वान् पुरुष अनेक कलाओं को प्रकाशित कर स्वयं दैन्यरहित होकर प्रजाओं को अनेक विपत्तियों से पार कर सकता है अर्थात् पदार्थविद्यावेत्ता विद्वान् पुरुष कला-कौशलादि-निर्माण द्वारा स्वयं ऐश्वर्य्यसम्पन्न होता और प्रजाजनों को भी धनवान् बनाता है, इसलिये उचित है कि सब विद्वान् पदार्थविद्या द्वारा उन्नत हों ॥३४ ॥