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Rigveda / 8 / 20 / 6

अमा॑य वो मरुतो॒ यात॑वे॒ द्यौर्जिही॑त॒ उत्त॑रा बृ॒हत् । यत्रा॒ नरो॒ देदि॑शते त॒नूष्वा त्वक्षां॑सि बा॒ह्वो॑जसः ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 8 | Sukta : 20 | Mantra No : 6

In Hindi:

ऋषि : सोभरिः काण्वः | देवता : मरूतः | छन्द : पादनिचृत्पङ्क्ति | स्वर : पञ्चमः

विषय :

पदपाठ : अमा॑य । वः॒ । म॒रु॒तः॒ । यात॑वे । द्यौः । जिही॑ते । उत्ऽत॑रा । बृ॒हत् । यत्र॑ । नरः॑ । देदि॑शते । त॒नूषु॑ । आ । त्वक्षां॑सि ब॒हुऽओ॑जसः ॥ ८.२०.६

पदार्थ : (मरुतः) हे शत्रुसंहार करनेवाले योद्धाओ ! (वः, अमाय, यातवे) आपके बल को जानने के लिये (उत्तरा, द्यौः) उत्कृष्टतर द्युलोक भी (बृहत्) अन्तरिक्ष को (जिहीते) छोड़ देता है (यत्र) जब (बाह्वोजसः) बाहुपराक्रमवाले (नरः) नेता आप (तनूषु) स्वकीय शरीरों में (त्वक्षांसि) दीप्त संग्रामयोग्य आभरणों को (आदेदिशते) धारण करने लगते हैं ॥६॥

भावार्थ : इस मन्त्र का भाव यह है कि शत्रुओं का संहार करनेवाले विजयी योद्धा जब युद्ध के आभूषणों को धारण करते हैं, तब मानो द्युलोक अन्तरिक्ष लोक से नीचे आकर अपने तेज का प्रकाश करने लगता है अर्थात् योद्धाओं के युद्धसूचक चिह्न द्युलोक के समान प्रकाशवाले होते हैं, या यों कहो कि दिव्य शक्तियों को धारण किये हुए योद्धा सूर्य्यसमान दीप्तिमान् प्रतीत होते हैं ॥६ ॥