Rigveda / 8 / 21 / 2
उप॑ त्वा॒ कर्म॑न्नू॒तये॒ स नो॒ युवो॒ग्रश्च॑क्राम॒ यो धृ॒षत् । त्वामिद्ध्य॑वि॒तारं॑ ववृ॒महे॒ सखा॑य इन्द्र सान॒सिम् ॥
Veda : Rigveda | Mandal : 8 | Sukta : 21 | Mantra No : 2
In English:
Seer : sobhariH kaaNvaH | Devta : indra: | Metre : paadanichRRitpa~Nkti | Tone : pa~nchamaH
Subject : English Translation will be uploaded as and when ready
Verse : upa tvaa karmannuutaye sa no yuvograshchakraama yo dhRRiShat . tvaamiddhyavitaara.m vavRRimahe sakhaaya indra saanasim .
Component Words : upa . tvaa . karman . uutaye . saH . naH . yuvaa . ugraH . chakaama . yaH . dhRRiShat . tvaam . it . hi . avitaaram . vavRRimahe . sakhaayaH . indra . saanasim . 8.21.2
In Hindi:
ऋषि : सोभरिः काण्वः | देवता : इन्द्र: | छन्द : पादनिचृत्पङ्क्ति | स्वर : पञ्चमः
विषय :
पदपाठ : उप॑ । त्वा॒ । कर्म॑न् । ऊ॒तये॑ । सः । नः॒ । युवा॑ । उ॒ग्रः । च॒का॒म॒ । यः । धृ॒षत् । त्वाम् । इत् । हि । अ॒वि॒तार॑म् । व॒वृ॒महे॑ । सखा॑यः । इ॒न्द्र॒ । सा॒न॒सिम् ॥ ८.२१.२
पदार्थ : (कर्मणि) कर्म को प्रारम्भ करने पर (ऊतये) रक्षार्थ (त्वा, उप) आप ही के समीप आते हैं (सः) क्योंकि वह सेनापति आप (युवा) युवावस्थावाले अतएव (उग्रः) रक्षा करने में समर्थ (नः) हमारे समीप (चक्राम) आते हैं (यः) जो (धृषत्) शत्रुओं को अभिभव प्राप्त करते हैं (इन्द्र) हे ऐश्वर्य्यसम्पन्न ! (सखायः) आपके मित्र हम लोग (अवितारम्) रक्षा करनेवाले (सानसिम्) सम्यक् भजनीय (त्वाम्, इत्, हि) आपको ही (ववृमहे) शरणरूप से आश्रयण करते हैं ॥२॥
भावार्थ : भाव यह है कि बड़े-२ विघ्नों का निवृत्त करना सेनाध्यक्ष ही के अधीन है, अतएव सम्राट् को चाहिये कि सेनाध्यक्ष उसी को बनावे, जो युवा तथा उत्साहसम्पन्न हो और जो प्रजाजनों की भले प्रकार रक्षा करनेवाला हो ॥२ ॥
In Sanskrit:
ऋषि : सोभरिः काण्वः | देवता : इन्द्र: | छन्द : पादनिचृत्पङ्क्ति | स्वर : पञ्चमः
पदपाठ : उप॑ । त्वा॒ । कर्म॑न् । ऊ॒तये॑ । सः । नः॒ । युवा॑ । उ॒ग्रः । च॒का॒म॒ । यः । धृ॒षत् । त्वाम् । इत् । हि । अ॒वि॒तार॑म् । व॒वृ॒महे॑ । सखा॑यः । इ॒न्द्र॒ । सा॒न॒सिम् ॥ ८.२१.२
भावार्थ :