Rigveda / 8 / 21 / 5
सीद॑न्तस्ते॒ वयो॑ यथा॒ गोश्री॑ते॒ मधौ॑ मदि॒रे वि॒वक्ष॑णे । अ॒भि त्वामि॑न्द्र नोनुमः ॥
Veda : Rigveda | Mandal : 8 | Sukta : 21 | Mantra No : 5
In English:
Seer : sobhariH kaaNvaH | Devta : indra: | Metre : kakubuShNik | Tone : RRIShabhaH
Subject : English Translation will be uploaded as and when ready
Verse : siidantaste vayo yathaa goshriite madhau madire vivakShaNe . abhi tvaamindra nonumaH .
Component Words : siidantaH . te . vayaH . yathaa . go.ashriite . madhau . madire . vivakShaNe . abhi . tvaam . indra . nonumaH . 8.21.5
In Hindi:
ऋषि : सोभरिः काण्वः | देवता : इन्द्र: | छन्द : ककुबुष्णिक् | स्वर : ऋषभः
विषय :
पदपाठ : सीद॑न्तः । ते॒ । वयः॑ । य॒था॒ । गोऽश्री॑ते । मधौ॑ । म॒दि॒रे । वि॒वक्ष॑णे । अ॒भि । त्वाम् । इ॒न्द्र॒ । नो॒नु॒मः॒ ॥ ८.२१.५
पदार्थ : (यथा, वयः) जैसे वृक्ष की शाखाएँ वृक्ष ही का अवलम्बन करके हरी-भरी रह सकती हैं, इसी प्रकार हम सब भी (ते) आपकी रक्षा द्वारा लब्ध (गोश्रीते) गव्य पदार्थों के साथ परिपक्व (मधौ) मधुर (मदिरे) आह्लादक (विवक्षणे) कार्यवहन में समर्थ अन्नादि रसों का (सीदन्तः) आश्रयण करते हुए प्रफुल्लित रहते हैं (इन्द्र) हे ऐश्वर्यशालिन् ! (त्वाम्) आपकी (अभिनोनुमः) बार बार स्तुति करते हैं ॥५॥
भावार्थ : जिस प्रकार शाखा आदि अवयवों के रहते ही वृक्ष की सत्ता है, विना अवयवों के नहीं, जिस प्रकार वृक्षमूल के रहते ही शाखाओं की सत्ता है, बिना मूल के नहीं, इसी प्रकार प्रजा और सेनाध्यक्ष इन दोनों का भी अस्तित्व परस्पराश्रय है, स्वाश्रय नहीं, इसलिये दोनों में परस्पर प्रेम होना आवश्यक है ॥५ ॥
In Sanskrit:
ऋषि : सोभरिः काण्वः | देवता : इन्द्र: | छन्द : ककुबुष्णिक् | स्वर : ऋषभः
पदपाठ : सीद॑न्तः । ते॒ । वयः॑ । य॒था॒ । गोऽश्री॑ते । मधौ॑ । म॒दि॒रे । वि॒वक्ष॑णे । अ॒भि । त्वाम् । इ॒न्द्र॒ । नो॒नु॒मः॒ ॥ ८.२१.५
भावार्थ :