Rigveda / 8 / 21 / 14
नकी॑ रे॒वन्तं॑ स॒ख्याय॑ विन्दसे॒ पीय॑न्ति ते सुरा॒श्व॑: । य॒दा कृ॒णोषि॑ नद॒नुं समू॑ह॒स्यादित्पि॒तेव॑ हूयसे ॥
Veda : Rigveda | Mandal : 8 | Sukta : 21 | Mantra No : 14
In English:
Seer : sobhariH kaaNvaH | Devta : indra: | Metre : paadanichRRitpa~Nkti | Tone : pa~nchamaH
Subject : English Translation will be uploaded as and when ready
Verse : nakii revanta.m sakhyaaya vindase piiyanti te suraashvaH . yadaa kRRiNoShi nadanu.m samuuhasyaaditpiteva huuyase .
Component Words : nakiH . revantam . sakhyaaya . vindase . piiyanti . te . suraashvaH . yadaa . kRRiNoShi . nadanum . sam . uuhasi . aat . it . pitaa.aiva . huuyase . 8.21.14
In Hindi:
ऋषि : सोभरिः काण्वः | देवता : इन्द्र: | छन्द : पादनिचृत्पङ्क्ति | स्वर : पञ्चमः
विषय :
पदपाठ : नकिः॑ । रे॒वन्त॑म् । स॒ख्याय॑ । वि॒न्द॒से॒ । पीय॑न्ति । ते॒ । सु॒रा॒श्वः॑ । य॒दा । कृ॒णोषि॑ । न॒द॒नुम् । सम् । ऊ॒ह॒सि॒ । आत् । इत् । पि॒ताऽइ॑व । हू॒य॒से॒ ॥ ८.२१.१४
पदार्थ : जो (सुराश्वः) मद्यपान से स्थूल होकर (ते, पीयन्ति) आपकी आज्ञाभङ्गरूप हिंसा को करते हैं, उनमें जो (रेवन्तम्) धनी हैं उनको भी (सख्याय) मित्रता के अर्थ (नकिः, विन्दसे) आप नहीं प्राप्त होते हैं (यत्) जो आप (समूहसि) समूह में (नदनुम्) संग्राम “नदनु” शब्द युद्ध नामों में पढ़ा है, नि० २।१६। (आकृणोषि) सम्यक् करते हैं (आत्, इत्) अतएव (पितेव, हूयसे) पिता के समान बुलाये जाते हैं ॥१४॥
भावार्थ : सेनापति को चाहिये कि वह स्वयं दुराचार से दूर रहते हुए दुराचारियों का सङ्ग भी न करे, क्योंकि ऐसा करने से संग्राम में विजय प्राप्त होना दुष्कर है और जो सेनापति विजय प्राप्त नहीं कर सकता, उसका प्रजाजन भी निरादर करते और वह सफलमनोरथ नहीं होता, इसलिये सेनापति को सदाचारसम्पन्न होकर विजय प्राप्त करने का सदैव उद्योग करना चाहिये ॥१४ ॥
In Sanskrit:
ऋषि : सोभरिः काण्वः | देवता : इन्द्र: | छन्द : पादनिचृत्पङ्क्ति | स्वर : पञ्चमः
पदपाठ : नकिः॑ । रे॒वन्त॑म् । स॒ख्याय॑ । वि॒न्द॒से॒ । पीय॑न्ति । ते॒ । सु॒रा॒श्वः॑ । य॒दा । कृ॒णोषि॑ । न॒द॒नुम् । सम् । ऊ॒ह॒सि॒ । आत् । इत् । पि॒ताऽइ॑व । हू॒य॒से॒ ॥ ८.२१.१४
भावार्थ :