Rigveda / 8 / 22 / 5
रथो॒ यो वां॑ त्रिवन्धु॒रो हिर॑ण्याभीशुरश्विना । परि॒ द्यावा॑पृथि॒वी भूष॑ति श्रु॒तस्तेन॑ नास॒त्या ग॑तम् ॥
Veda : Rigveda | Mandal : 8 | Sukta : 22 | Mantra No : 5
In English:
Seer : sobhariH kaaNvaH | Devta : ashvinau | Metre : nichRRidbRRihatii | Tone : madhyamaH
Subject : English Translation will be uploaded as and when ready
Verse : ratho yo vaa.m trivandhuro hiraNyaabhiishurashvinaa . pari dyaavaapRRithivii bhuuShati shrutastena naasatyaa gatam .
Component Words : rathaH . yaH . vaam . tri.avandhuraH . hiraNya.aabhiishuH . ashvinaa . pari . dyaavaapRRithivii iti . bhuuShati . shrutaH . tena . naasatyaa . aa . gatam . 8.22.5
In Hindi:
ऋषि : सोभरिः काण्वः | देवता : अश्विनौ | छन्द : निचृद्बृहती | स्वर : मध्यमः
विषय :
पदपाठ : रथः॑ । यः । वा॒म् । त्रि॒ऽव॒न्धु॒रः । हिर॑ण्यऽअभीशुः । अ॒श्वि॒ना॒ । परि॑ । द्यावा॑पृथि॒वी इति॑ । भूष॑ति । श्रु॒तः । तेन॑ । ना॒स॒त्या॒ । आ । ग॒त॒म् ॥ ८.२२.५
पदार्थ : (अश्विना) हे शीघ्रगतिवाले (नासत्या) असत्य को कभी स्वीकार न करनेवाले ! (यः, त्रिबन्धुरः) जो तीन स्थानों में बन्धनयुक्त वा ऊँचा-नीचा तथा (हिरण्याभीशुः) सुवर्ण की मेखलाओं से सुदृढ़ है, ऐसा (वाम्, रथः) आपका रथ (द्यावापृथिवी) द्युलोक तथा पृथिवीलोक को (परिभूषति) परिभूत=तिरस्कारयुक्त करता है, अतएव (श्रुतः) सर्वत्र प्रसिद्ध है (तेन) उसके द्वारा आप (आगतम्) आवें ॥५॥
भावार्थ : हे सत्यवादी न्यायाधीश तथा सेनाधीश ! आपका शिल्पी विद्वानों से रचित यान, जो ऊपर, नीचे तथा बीच में सुदृढ़ बंधा हुआ है अर्थात् जिसको कलायन्त्रों से भले प्रकार दृढ़ बनाया है, जो वाष्प द्वारा पृथिवी तथा अन्तरिक्ष में विचरता और जिससे आप शत्रुओं को पराजित करते हैं, उसमें आरूढ़ हुए हमारे यज्ञसदन को प्राप्त हों ॥५ ॥
In Sanskrit:
ऋषि : सोभरिः काण्वः | देवता : अश्विनौ | छन्द : निचृद्बृहती | स्वर : मध्यमः
पदपाठ : रथः॑ । यः । वा॒म् । त्रि॒ऽव॒न्धु॒रः । हिर॑ण्यऽअभीशुः । अ॒श्वि॒ना॒ । परि॑ । द्यावा॑पृथि॒वी इति॑ । भूष॑ति । श्रु॒तः । तेन॑ । ना॒स॒त्या॒ । आ । ग॒त॒म् ॥ ८.२२.५
भावार्थ :