Rigveda / 8 / 23 / 6
अग्ने॑ या॒हि सु॑श॒स्तिभि॑र्ह॒व्या जुह्वा॑न आनु॒षक् । यथा॑ दू॒तो ब॒भूथ॑ हव्य॒वाह॑नः ॥
Veda : Rigveda | Mandal : 8 | Sukta : 23 | Mantra No : 6
In English:
Seer : vishvamanaa vaiyashvaH | Devta : agniH | Metre : uShNik | Tone : RRIShabhaH
Subject : English Translation will be uploaded as and when ready
Verse : agne yaahi sushastibhirhavyaa juhvaana aanuShak . yathaa duuto babhuutha havyavaahanaH .
Component Words : agne . yaahi . sushasti.abhiH . havyaa . juhvaanaH . aanuShak . yathaa . duutaH . babhuutha . havya.avaahanaH . 8.23.6
In Hindi:
ऋषि : विश्वमना वैयश्वः | देवता : अग्निः | छन्द : उष्णिक् | स्वर : ऋषभः
विषय :
पदपाठ : अग्ने॑ । या॒हि । सु॒श॒स्तिऽभिः॑ । ह॒व्या । जुह्वा॑नः । आ॒नु॒षक् । यथा॑ । दू॒तः । ब॒भूथ॑ । ह॒व्य॒ऽवाह॑नः ॥ ८.२३.६
पदार्थ : (अग्ने) हे संग्रामवेत्ता विद्वान् ! आप (यथा) जो (हव्यवाहनः, दूतः, बभूथ) प्रजाओं से राजभाग आहरण करने के लिये सम्राट् के दूत सदृश हैं, इसलिये (सुशस्तिभिः) शोभन प्रार्थनाओं से (हव्या, जुह्वानः) प्रजाओं को हव्यपदार्थ प्रदान करते हुए (आनुषक्, याहि) सबकी रक्षा करते हुए भ्रमण करें ॥६॥
भावार्थ : भाव यह है कि संग्रामवेत्ता विद्वान् सम्राट् के दूतसदृश होते हैं, जो प्रजाओं से राजभाग लेते हैं, या यों कहो कि जिस प्रकार शिक्षा, कल्प तथा व्याकरणादि वेद के अङ्ग हैं, इसी प्रकार परा अपरा विद्यावेत्ता विद्वान् सम्राट् के अङ्ग कहलाते हैं, इसलिये सम्राट् को उचित है कि उक्त विद्वान् उत्पन्न करके सुरीति तथा सुनीति का प्रचार करे, ताकि प्रजा में सुव्यवस्था उत्पन्न होकर प्रजागण सदैव धर्मपरायण हों और वे विद्वान् सब प्रजाओं की रक्षा करते हुए राजभाग को ग्रहण करें ॥६ ॥
In Sanskrit:
ऋषि : विश्वमना वैयश्वः | देवता : अग्निः | छन्द : उष्णिक् | स्वर : ऋषभः
पदपाठ : अग्ने॑ । या॒हि । सु॒श॒स्तिऽभिः॑ । ह॒व्या । जुह्वा॑नः । आ॒नु॒षक् । यथा॑ । दू॒तः । ब॒भूथ॑ । ह॒व्य॒ऽवाह॑नः ॥ ८.२३.६
भावार्थ :