Rigveda / 8 / 23 / 8
य॒ज्ञेभि॒रद्भु॑तक्रतुं॒ यं कृ॒पा सू॒दय॑न्त॒ इत् । मि॒त्रं न जने॒ सुधि॑तमृ॒ताव॑नि ॥
Veda : Rigveda | Mandal : 8 | Sukta : 23 | Mantra No : 8
In English:
Seer : vishvamanaa vaiyashvaH | Devta : agniH | Metre : uShNik | Tone : RRIShabhaH
Subject : English Translation will be uploaded as and when ready
Verse : yaj~nebhiradbhutakratu.m ya.m kRRipaa suudayanta it . mitra.m na jane sudhitamRRitaavani .
Component Words : yaj~nebhiH . adbhuta.akratum . yam . kRRipaa . suudayante . it . mitram . na . jane . su.adhitam . RRIta.avani . 8.23.8
In Hindi:
ऋषि : विश्वमना वैयश्वः | देवता : अग्निः | छन्द : उष्णिक् | स्वर : ऋषभः
विषय :
पदपाठ : य॒ज्ञेभिः॑ । अद्भु॑तऽक्रतुम् । यम् । कृ॒पा । सू॒दय॑न्ते । इत् । मि॒त्रम् । न । जने॑ । सुऽधि॑तम् । ऋ॒तऽव॑नि ॥ ८.२३.८
पदार्थ : (यम्) जिस (कृपा) स्वसामर्थ्य से (अद्भुतक्रतुम्) अद्भुतकर्मोंवाले (ऋतावनि, जने) यज्ञ करनेवाले मनुष्य में (मित्रम्, न) मित्र के समान (सुधितम्) तृप्त रहनेवाले विद्वान् को यष्टा लोग (यज्ञेभिः) उसके उद्देश्य से अनेक यज्ञों द्वारा (सूदयन्ते, इत्) अनुकूल ही रखते हैं ॥८॥
भावार्थ : वह याज्ञिक विद्वान् यज्ञ को जिसका ऋत=सत्य नाम है, इस नाम को सार्थक करके प्रजा को सत्यपरायण तथा सदाचारवर्ती बनाकर इस मनुष्यजन्म के लक्ष्य को सफल करें ॥८ ॥
In Sanskrit:
ऋषि : विश्वमना वैयश्वः | देवता : अग्निः | छन्द : उष्णिक् | स्वर : ऋषभः
पदपाठ : य॒ज्ञेभिः॑ । अद्भु॑तऽक्रतुम् । यम् । कृ॒पा । सू॒दय॑न्ते । इत् । मि॒त्रम् । न । जने॑ । सुऽधि॑तम् । ऋ॒तऽव॑नि ॥ ८.२३.८
भावार्थ :