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Rigveda / 8 / 23 / 16

व्य॑श्वस्त्वा वसु॒विद॑मुक्ष॒ण्युर॑प्रीणा॒दृषि॑: । म॒हो रा॒ये तमु॑ त्वा॒ समि॑धीमहि ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 8 | Sukta : 23 | Mantra No : 16

In Hindi:

ऋषि : विश्वमना वैयश्वः | देवता : अग्निः | छन्द : निचृदुष्णिक् | स्वर : ऋषभः

विषय :

पदपाठ : विऽअ॑श्वः । त्वा॒ । व॒सु॒ऽविद॑म् । उ॒क्ष॒ण्युः । अ॒प्री॒णा॒त् । ऋषिः॑ । म॒हः । रा॒ये । तम् । ऊँ॒ इति॑ । त्वा॒ । सम् । इ॒धी॒म॒हि॒ ॥ ८.२३.१६

पदार्थ : (उक्षण्युः) जो बलों की वर्षा करनेवाले आपको चाहनेवाला (व्यश्वः, ऋषिः) अश्वादि सम्पत्तिरहित विद्वान् (महः, राये) पर्याप्त धन के लिये (वसुविदम्, अप्रीणात्) धन को प्राप्त करानेवाले आपको आराधनाद्वारा प्रसन्न करता है, (तम्, उ, त्वा) उन्हीं आपको (समिधीमहि) यशों द्वारा हम लोग भी प्रकाशित करते हैं ॥१६॥

भावार्थ : इस मन्त्र का भाव यह है कि जो पुरुष बलद्वारा प्रजा को सिञ्चन करनेवाले क्षत्रियवर्ग को अपने देश में उत्पन्न कर वृद्धि करते हैं, वे ऐश्वर्य्य तथा धन-धान्यादि सम्पूर्ण पदार्थों से विभूषित होते हैं ॥१६ ॥