Donation Appeal Download Our App
Choose Mantra
Rigveda / 1 / 158 / 5

न मा॑ गरन्न॒द्यो॑ मा॒तृत॑मा दा॒सा यदीं॒ सुस॑मुब्धम॒वाधु॑:। शिरो॒ यद॑स्य त्रैत॒नो वि॒तक्ष॑त्स्व॒यं दा॒स उरो॒ अंसा॒वपि॑ ग्ध ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 1 | Sukta : 158 | Mantra No : 5

In Hindi:

ऋषि : दीर्घतमा औचथ्यः | देवता : अश्विनौ | छन्द : निचृत्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।

पदपाठ : न। मा॒। ग॒र॒न्। न॒द्यः॑। मा॒तृऽत॑माः। दा॒साः। यत्। ई॒म्। सुऽस॑मुब्धम्। अ॒व॒ऽअधुः॑। शिरः॑। यत्। अ॒स्य॒। त्रै॒त॒नः। वि॒ऽतक्ष॑त्। स्व॒यम्। दा॒सः। उरः॑। अंसौ॑। अपि॑। ग्धेति॑ ग्ध ॥ १.१५८.५

पदार्थ : हे विद्वानो ! (दासाः) सुख देनेवाले दास जन (सुसमुब्धम्) अति सूधे स्वभाववाले (यत्) जिस मुझे (ईम्) सब ओर से (अबाधुः) पीड़ित करें उस (मा) मुझे (मातृतमाः) माताओं के समान मान करने-करानेवाली (नद्यः) नदियाँ (न) न (गरन्) निगलें न गलावें, (यत्) जो (त्रैतनः) तीन अर्थात् शारीरिक, मानसिक और आत्मिक सुखों का विस्तार करनेवाला (दासः) सेवक (अस्य) इस मेरे (शिरः) शिर को (वितक्षत्) विविध प्रकार की पीड़ा देवे वह (स्वयम्) आप अपने (उरः) वक्षःस्थल और (अंसौ) स्कन्धों को (अपि, ग्ध) काटे ॥ ५ ॥

भावार्थ : मनुष्यों को चाहिये कि ऐसा प्रयत्न करें जिससे नदी और समुद्र आदि न डुबा मारें। शूद्र आदि दास जनसेवा करने पर नियत हुआ भी आलस्यवश अति सूधे स्वभाववाले स्वामी को पीड़ा दिया करता अर्थात् उनका काम मन से नहीं करता, इससे उसको अच्छी शिक्षा देवे और अनुचित करने में ताड़ना भी दे तथा अपने अपने शरीर के अङ्गों की सदा पुष्टि करें ॥ ५ ॥