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Rigveda / 1 / 159 / 5

तद्राधो॑ अ॒द्य स॑वि॒तुर्वरे॑ण्यं व॒यं दे॒वस्य॑ प्रस॒वे म॑नामहे। अ॒स्मभ्यं॑ द्यावापृथिवी सुचे॒तुना॑ र॒यिं ध॑त्तं॒ वसु॑मन्तं शत॒ग्विन॑म् ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 1 | Sukta : 159 | Mantra No : 5

In Hindi:

ऋषि : दीर्घतमा औचथ्यः | देवता : द्यावापृथिव्यौ | छन्द : निचृज्जगती | स्वर : निषादः

विषय : फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।

पदपाठ : तत्। राधः॑। अ॒द्य। स॒वि॒तुः। वरे॑ण्यम्। व॒यम्। दे॒वस्य॑। प्र॒ऽस॒वे। म॒ना॒म॒हे॒। अ॒स्मभ्य॑म्। द्या॒वा॒पृ॒थि॒वी॒ इति॑। सु॒ऽचे॒तुना॑। र॒यिम्। ध॒त्त॒म्। वसु॑ऽमन्तम्। श॒त॒ऽग्विन॑म् ॥ १.१५९.५

पदार्थ : हे अध्यापक और उपदेशको ! (वयम्) हम लोग (अद्य) आज (सवितुः) जगत् के उत्पन्न करने (देवस्य) और प्रकाश करनेवाले ईश्वर के (प्रसवे) उत्पन्न किये हुए इस जगत् में जिस (वरेण्यम्) स्वीकार करने योग्य (राधः) द्रव्य को (मनामहे) जानते हैं (तत्) उस (शतग्विनम्) सैकड़ों गौओंवाले (वसुमन्तम्) नाना प्रकार के धनों से युक्त (रयिम्) धन को (सुचेतुना) सुन्दर ज्ञान से (अस्मभ्यम्) हम लोगों के लिये (द्यावापृथिवी) भूमिमण्डल और सूर्यमण्डल के समान तुम (धत्तम्) धारण करो ॥ ५ ॥

भावार्थ : इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। विद्वान् जन जैसे द्यावापृथिवी सब प्राणियों को सुखी करते हैं, वैसे सबको विद्या और धन की उन्नति से सुखी करें ॥ ५ ॥