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Rigveda / 1 / 160 / 2

उ॒रु॒व्यच॑सा म॒हिनी॑ अस॒श्चता॑ पि॒ता मा॒ता च॒ भुव॑नानि रक्षतः। सु॒धृष्ट॑मे वपु॒ष्ये॒३॒॑ न रोद॑सी पि॒ता यत्सी॑म॒भि रू॒पैरवा॑सयत् ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 1 | Sukta : 160 | Mantra No : 2

In Hindi:

ऋषि : दीर्घतमा औचथ्यः | देवता : द्यावापृथिव्यौ | छन्द : निचृज्जगती | स्वर : निषादः

विषय : फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।

पदपाठ : उ॒रु॒ऽव्यच॑सा। म॒हिनी॒ इति॑। अ॒स॒श्चता॑। पि॒ता। मा॒ता। च॒। भुव॑नानि। र॒क्ष॒तः॒। सु॒धृष्ट॑मे॒ इति॑ सु॒ऽधृष्ट॑मे। वपु॒ष्ये॒३॒॑ इति॑। न। रोद॑सी॒ इति॑। पि॒ता। यत्। सी॒म्। अ॒भि। रू॒पैः। अवा॑सयत् ॥ १.१६०.२

पदार्थ : हे मनुष्यो ! (पिता) पालन करनेवाला विद्युदग्नि (यत्) जिन (रोदसी) सूर्य और भूमिमण्डल को (रूपैः) शुक्ल, कृष्ण, हरित, पीतादि रूपों से (सीम्) सब ओर से (अभ्यवासयत्) ढाँपता है उन (असश्चता) विलक्षण रूपवाले (महिनी) बड़े (उरुव्यचसा) बहुत व्याप्त होनेवाले (सुधृष्टमे) सुन्दर अत्यन्त उत्कर्षता से सहनेवाले (वपुष्ये) रूप में प्रसिद्ध हुए सूर्यमण्डल और भूमिमण्डलों के (न) समान (माता) मान्य करनेवाली स्त्री (पिता, च) और पालना करनेवाला जन (भुवनानि) जिनमें प्राणी होते हैं उन लोकों की (रक्षतः) रक्षा करते हैं ॥ २ ॥

भावार्थ : जैसे समस्त प्राणियों को भूमि और सूर्यमण्डल पालते और धारण करते हैं, वैसे माता-पिता सन्तानों की पालना और रक्षा करते हैं। जो जलों और पृथिवी वा इनके विकारों में रूप दिखाई देता है, वह व्याप्त अग्नि ही का है, यह समझना चाहिये ॥ २ ॥