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Rigveda / 1 / 161 / 3

अ॒ग्निं दू॒तं प्रति॒ यदब्र॑वीत॒नाश्व॒: कर्त्वो॒ रथ॑ उ॒तेह कर्त्व॑:। धे॒नुः कर्त्वा॑ युव॒शा कर्त्वा॒ द्वा तानि॑ भ्रात॒रनु॑ वः कृ॒त्व्येम॑सि ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 1 | Sukta : 161 | Mantra No : 3

In Hindi:

ऋषि : दीर्घतमा औचथ्यः | देवता : ऋभवः | छन्द : निचृत्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।

पदपाठ : अ॒ग्निम्। दू॒तम्। प्रति॑। यत्। अब्र॑वीतन। अश्वः॑। कर्त्वः॑। रथः॑। उ॒त। इ॒ह। कर्त्वः॑। धे॒नुः। कर्त्वा॑। यु॒व॒शा। कर्त्वा॑। द्वा। तानि॑। भ्रा॒तः॒। अनु॑। वः॒। कृ॒त्वी। आ। इ॒म॒सि॒ ॥ १.१६१.३

पदार्थ : हे (भ्रातः) बन्धु विद्वान् ! (यत्) जो (अश्वः) शीघ्रगामी (कर्त्त्वः) करने योग्य अर्थात् कलायन्त्रादि (से) सिद्ध होनेवाला नानाविध शिल्पक्रियाजन्य पदार्थ (उत) अथवा (इह) यहाँ (रथः) रमण करने का साधन (कर्त्त्वः) करने योग्य विमान आदि यान है उसको (अग्निम्) बिजुली आदि (दूतम्) दूत कर्मकारी अग्नि के (प्रति) प्रति जो (अब्रवीतन) कहे, उसके उपदेश से जो (कर्त्त्वा) करने योग्य (धेनुः) वाणी है वा जो (कर्त्त्वा) करने योग्य (युवशा) मिले-अनमिले व्यवहारों से विस्तृत काम है वा जो अग्नि और वाणी (द्वा) दो हैं (तानि) उन सबको (वः) तुम्हारी उत्तेजना से सिद्ध (कृत्वी) कर हम लोग (अनु, सा इमसि) अनुक्रम से उक्त पदार्थों को प्राप्त होते हैं ॥ ३ ॥

भावार्थ : जो जिसके लिये सत्य विद्या को कहे और अग्नि आदि से कर्त्तव्य का उपदेश करे, वह उसको बन्धु के समान जाने और वह करने योग्य कामों को सिद्ध कर सके ॥ ३ ॥