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Rigveda / 1 / 161 / 5

हना॑मैनाँ॒ इति॒ त्वष्टा॒ यदब्र॑वीच्चम॒सं ये दे॑व॒पान॒मनि॑न्दिषुः। अ॒न्या नामा॑नि कृण्वते सु॒ते सचाँ॑ अ॒न्यैरे॑नान्क॒न्या॒३॒॑ नाम॑भिः स्परत् ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 1 | Sukta : 161 | Mantra No : 5

In Hindi:

ऋषि : दीर्घतमा औचथ्यः | देवता : ऋभवः | छन्द : निचृज्जगती | स्वर : निषादः

विषय : फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।

पदपाठ : हना॑म। ए॒ना॒न्। इति॑। त्वष्टा॑। यत्। अब्र॑वीत्। च॒म॒सम्। ये। दे॒व॒ऽपान॑म्। अनि॑न्दिषुः। अ॒न्या। नामा॑नि। कृ॒ण्व॒ते॒। सु॒ते। सचा॑। अ॒न्यैः। ए॑नान्। क॒न्या॑। नाम॑ऽभिः। स्प॒र॒त् ॥ १.१६१.५

पदार्थ : हे मनुष्यो ! (त्वष्टा) छिन्न-भिन्न करनेवाला सूर्य के समान विद्वान् (यत्) जिस (देवपानम्) किरण वा इन्द्रियों से पीने योग्य (चमसम्) मेघ जल को (अब्रवीत्) कहता है (ये) जो इसकी (अनिन्दिषुः) निन्दा करें उन (एनान्) इनको हम लोग (हनाम) मारें नष्ट करें। जो (सचान्) संयुक्त (अन्यैः) और (नामभिः) नामों से (अन्या) और (नामानि) नामों को (सुते) उत्पन्न किये हुए व्यवहार में (कृण्वते) प्रसिद्ध करते हैं (एनान्) इन जनों को (कन्या) कुमारी कन्या (स्परत्) प्रसन्न करे (इति) इस प्रकार से उनके प्रति तुम भी वर्त्तो ॥ ५ ॥

भावार्थ : जो विद्वानों की निन्दा करें, विद्वानों में मूर्खबुद्धि और मूर्खों में विद्वद्बुद्धि करें, वे ही खल सबको तिरस्कार करने योग्य हैं ॥ ५ ॥