Rigveda / 1 / 161 / 13
सु॒षु॒प्वांस॑ ऋभव॒स्तद॑पृच्छ॒तागो॑ह्य॒ क इ॒दं नो॑ अबूबुधत्। श्वानं॑ व॒स्तो बो॑धयि॒तार॑मब्रवीत्संवत्स॒र इ॒दम॒द्या व्य॑ख्यत ॥
Veda : Rigveda | Mandal : 1 | Sukta : 161 | Mantra No : 13
In English:
Seer : diirghatamaa auchathyaH | Devta : RRibhavaH | Metre : bhuriktriShTup | Tone : dhaivataH
Subject : English Translation Under Process
Verse : suShupvaa.msa RRIbhavastadapRRichChataagohya ka ida.m no abuubudhat. shvaana.m vasto bodhayitaaramabraviitsa.mvatsara idamadyaa vyakhyata .
Component Words : suShupvaa.msaH. RRIbhavaH. tat. apRRichChata. agohya. kaH. idam. naH. abuubudhat. shvaanam. vastaH. bodhayitaaram. abraviit. sav.Nmvatsare. idam. adya. vi. akhyata . 1.161.13
In Hindi:
ऋषि : दीर्घतमा औचथ्यः | देवता : ऋभवः | छन्द : भुरिक्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः
विषय : फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।
पदपाठ : सु॒षु॒प्वांसः॑। ऋ॒भ॒वः॒। तत्। अ॒पृ॒च्छ॒त॒। अगो॑ह्य। कः। इ॒दम्। नः॒। अ॒बू॒बु॒ध॒त्। श्वान॑म्। व॒स्तः। बो॒ध॒यि॒तार॑म्। अ॒ब्र॒वी॒त्। स॒व्ँम्व॒त्स॒रे। इ॒दम्। अ॒द्य। वि। अ॒ख्य॒त॒ ॥ १.१६१.१३
पदार्थ : हे (सुसुप्वांसः) सोनेवाले (ऋभवः) बुद्धिमान् जनो ! तुम जिस काम को (अपृच्छत) पूछो और जिसको (वि, अख्यत) प्रसिद्ध कहो (तत्, इदम्) उस इस काम को (नः) हम लोगों को (कः) कौन (अबूबुधत्) जनावे। हे (अगोह्य) न गुप्त राखने योग्य (वस्तः) ढाँपने-छिपानेवाला (श्वानम्) कार्य्यों में प्रेरणा देने और (बोधयितारम्) शुभागुण विषय जनानेवाले को जैसे जिस विषय को (अब्रवीत्) कहे वैसे उस (इदम्) प्रत्यक्ष विषय को (संवत्सरे) एक वर्ष में वा (अद्य) आज तू कह ॥ १३ ॥
भावार्थ : बुद्धिमान् जन जिस-जिस विषय को विद्वानों को पूछ कर निश्चय करें उस उस को मूर्ख निर्बुद्धि जन निश्चय नहीं कर सकें, जड़ मन्दमति जन जितना एक संवत्सर में पढ़ता है, उतना बुद्धिमान् एक दिन में ग्रहण कर सकता है ॥ १३ ॥
In Sanskrit:
ऋषि : दीर्घतमा औचथ्यः | देवता : ऋभवः | छन्द : भुरिक्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः
विषय : पुनस्तमेव विषयमाह ।
पदपाठ : सु॒षु॒प्वांसः॑। ऋ॒भ॒वः॒। तत्। अ॒पृ॒च्छ॒त॒। अगो॑ह्य। कः। इ॒दम्। नः॒। अ॒बू॒बु॒ध॒त्। श्वान॑म्। व॒स्तः। बो॒ध॒यि॒तार॑म्। अ॒ब्र॒वी॒त्। स॒व्ँम्व॒त्स॒रे। इ॒दम्। अ॒द्य। वि। अ॒ख्य॒त॒ ॥ १.१६१.१३
पदार्थ : (सुसुप्वांसः) ये सुप्ताः (ऋभवः) मेधाविनः (तत्) (अपृच्छत) (अगोह्य) अरक्ष्य (कः) (इदम्) कर्म (नः) अस्मान् (अबूबुधत्) बोधयेत् (श्वानम्) प्रेरकम् (वस्तः) आच्छादकः (बोधयितारम्) ज्ञापयितारम् (अब्रवीत्) ब्रूयात् (संवत्सरे) (इदम्) प्रत्यक्षम् (अद्य) अस्मिन् दिने (वि) (अख्यत) प्रख्यापय ॥ १३ ॥
अन्वय : हे सुसुप्वांस ऋभवो यूयं यदपृच्छत यच्च व्यख्यत तदिदं नः कोऽबूबुधत्। हे अगोह्य वस्तः श्वानं बोधयितारं यथा यदब्रीवत्तदिदं संवत्सरेऽद्य वा त्वं ब्रूहि ॥ १३ ॥
भावार्थ : धीमन्तो यद्यद्विदुषः पृष्ट्वा निश्चिनुयुः। तत्तन्न मूर्खा निश्चेतुं शक्नुयुः। जडधीर्य्यावत् संवत्सरेऽधीते तावत् प्राज्ञ एकस्मिन् दिने ग्रहीतुं शक्नोति ॥ १३ ॥