Donation Appeal Download Our App
Choose Mantra
Rigveda / 1 / 162 / 1

मा नो॑ मि॒त्रो वरु॑णो अर्य॒मायुरिन्द्र॑ ऋभु॒क्षा म॒रुत॒: परि॑ ख्यन्। यद्वा॒जिनो॑ दे॒वजा॑तस्य॒ सप्ते॑: प्रव॒क्ष्यामो॑ वि॒दथे॑ वी॒र्या॑णि ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 1 | Sukta : 162 | Mantra No : 1

In Hindi:

ऋषि : दीर्घतमा औचथ्यः | देवता : मित्रादयो लिङ्गोक्ताः | छन्द : निचृत्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : अब एकसौ बासठवें सूक्त का आरम्भ है। उसके प्रथम मन्त्र में घोड़े और बिजुली रूप से व्याप्त जो अग्नि है, उसकी विद्या का वर्णन करते हैं ।

पदपाठ : मा। नः॒। मि॒त्रः। वरु॑णः। अ॒र्य॒मा। आ॒युः। इन्द्रः॑। ऋ॒भु॒क्षाः। म॒रुतः॑। परि॑। ख्य॒न्। यत्। वा॒जिनः॑। दे॒वऽजा॑तस्य। सप्तेः॑। प्र॒ऽव॒क्ष्यामः॑। वि॒दथे॑। वी॒र्या॑णि ॥ १.१६२.१

पदार्थ : ऋतु-ऋतु में यज्ञ करनेहारे हम लोग (विदथे) संग्राम में (यत्) जिस (वाजिनः) वेगवान् (देवजातस्य) विद्वानों के वा दिव्य गुणों से प्रकट हुए (सप्तेः) घोड़े के (वीर्याणि) पराक्रमों को (प्रवक्ष्यामः) कहेंगे, उस (नः) हमारे घोड़ों के पराक्रमों को (मित्रः) मित्र (वरुणः) श्रेष्ठ (अर्यमा) न्यायाधीश (आयुः) ज्ञाता (इन्द्रः) ऐश्वर्यवान् (ऋभुक्षाः) बुद्धिमान् और (मरुतः) ऋत्विज् लोग (मा, परि, ख्यन्) छोड़ के मत कहें और उसके अनुकूल उसकी प्रशंसा करें ॥ १ ॥

भावार्थ : मनुष्यों को प्रशंसित बलवान् अच्छे सीखे हुए घोड़े ग्रहण करने चाहिये, जिससे सर्वत्र विजय और ऐश्वर्यों को प्राप्त हों ॥ १ ॥