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Rigveda / 1 / 162 / 11

यत्ते॒ गात्रा॑द॒ग्निना॑ प॒च्यमा॑नाद॒भि शूलं॒ निह॑तस्याव॒धाव॑ति। मा तद्भूम्या॒मा श्रि॑ष॒न्मा तृणे॑षु दे॒वेभ्य॒स्तदु॒शद्भ्यो॑ रा॒तम॑स्तु ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 1 | Sukta : 162 | Mantra No : 11

In Hindi:

ऋषि : दीर्घतमा औचथ्यः | देवता : मित्रादयो लिङ्गोक्ताः | छन्द : विराट्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।

पदपाठ : यत्। ते॒। गात्रा॑त्। अ॒ग्निना॑। प॒च्यमा॑नात्। अ॒भि। शूल॑म्। निऽह॑तस्य। अ॒व॒ऽधाव॑ति। मा। तत्। भूम्या॑म्। आ। श्रि॒ष॒त्। मा। तृणे॑षु। दे॒वेभ्यः॑। तत्। उ॒शत्ऽभ्यः॑। रा॒तम्। अ॒स्तु॒ ॥ १.१६२.११

पदार्थ : हे विद्वान् ! (निहतस्य) निरन्तर चलायमान हुए (ते) तुम्हारे (अग्निना) क्रोधाग्नि से (पच्यमानात्) तपाये हुए (गात्रात्) हाथ से (यत्) जो शस्त्र (अभि, शूलम्) लखके शूल के समान पीड़ाकारक शत्रु के सम्मुख (अव, धावति) चलाया जाता है (तत्) वह (भूम्याम्) भूमि में (मा, आ, श्रिषत्) न गिरे वा लगे और वह (तृणेषु) घासादि में (मा) मत आश्रित हो किन्तु (उशद्भ्यः) आपके पदार्थों की चाहना करनेवाले (देवेभ्यः) दिव्य गुणी शत्रु के लिये (रातम्) दिया (अस्तु) हो ॥ ११ ॥

भावार्थ : बलिष्ठ विद्वान् मनुष्यो को चाहिये कि संग्राम में शस्त्र चलाने के समय विचारपूर्वक ही शस्त्र चलावें, जिससे क्रोधपूर्वक चला शस्त्र भूमि आदि में न पड़े किन्तु शत्रुओं को ही मारनेवाला हो ॥ ११ ॥