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Rigveda / 1 / 163 / 2

य॒मेन॑ द॒त्तं त्रि॒त ए॑नमायुन॒गिन्द्र॑ एणं प्रथ॒मो अध्य॑तिष्ठत्। ग॒न्ध॒र्वो अ॑स्य रश॒नाम॑गृभ्णा॒त्सूरा॒दश्वं॑ वसवो॒ निर॑तष्ट ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 1 | Sukta : 163 | Mantra No : 2

In Hindi:

ऋषि : दीर्घतमा औचथ्यः | देवता : अश्वोऽग्निः | छन्द : भुरिक्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।

पदपाठ : य॒मेन॑। द॒त्तम्। त्रि॒तः। ए॒न॒म्। अ॒यु॒न॒क्। इन्द्रः॑। ए॒न॒म्। प्र॒थ॒मः। अधि॑। अ॒ति॒ष्ठ॒त्। ग॒न्ध॒र्वः। अ॒स्य॒। र॒श॒नाम्। अ॒गृ॒भ्णा॒त्। सूरा॑त्। अश्व॑म्। व॒स॒वः॒। निः। अ॒त॒ष्ट॒ ॥ १.१६३.२

पदार्थ : हे (वसवः) चौबीस वर्ष ब्रह्मचर्य के सेवन से विद्या को प्राप्त हुए सज्जनो ! तुम जिस (यमेन) नियमकर्त्ता वायु से (दत्तम्) दिये हुए (एनम्) इस पूर्वोक्त प्रशंसित अग्नि को (त्रितः) अनेकों पदार्थ वा अनेकों व्यवहारों को तरनेवाला (इन्द्रः) बिजुलीरूप अग्नि (आयुनक्) शिल्प कामों में नियुक्त करे (प्रथमः) वा प्रख्यातिमान् पुरुष (एनम्) इस उक्त प्रशंसित अग्नि का (अध्यतिष्ठत्) अधिष्ठाता हो वा (गन्धर्वः) पृथिवी को धारण करनेवाला वायु (अस्य) इसकी (रशनाम्) स्नेह क्रिया को और (सूरात्) सूर्य से (अश्वम्) शीघ्रगमन करानेवाले अग्नि को (अगृभ्णात्) ग्रहण करे उसको (निरतष्ट) निरन्तर काम में लाओ ॥ २ ॥

भावार्थ : जो मनुष्य विद्वानों के उपदेश से पाई हुई विद्या को ग्रहण कर बिजुली से उत्पन्न हुए कारण से फैले वायु से धारण किये सूर्य से प्रकट हुए शीघ्रगामी अग्नि को प्रयोजन में लाते हैं, वे दरिद्रपन के नाश करनेवाले होते हैं ॥ २ ॥