Rigveda / 1 / 164 / 4
को द॑दर्श प्रथ॒मं जाय॑मानमस्थ॒न्वन्तं॒ यद॑न॒स्था बिभ॑र्ति। भूम्या॒ असु॒रसृ॑गा॒त्मा क्व॑ स्वि॒त्को वि॒द्वांस॒मुप॑ गा॒त्प्रष्टु॑मे॒तत् ॥
Veda : Rigveda | Mandal : 1 | Sukta : 164 | Mantra No : 4
In English:
Seer : diirghatamaa auchathyaH | Devta : vishvedevaa: | Metre : nichRRittriShTup | Tone : dhaivataH
Subject : English Translation Under Process
Verse : ko dadarsha prathama.m jaayamaanamasthanvanta.m yadanasthaa bibharti. bhuumyaa asurasRRigaatmaa kva svitko vidvaa.msamupa gaatpraShTumetat .
Component Words : kaH. dadarsha. prathamam. jaayamaanam. asthan.avantam. yat. anasthaa. bibharti. bhuumyaaH. asuH. asRRik. aatmaa. kva. svit. kaH. vidvaa.msam. upa. gaat. praShTum. etat . 1.164.4
In Hindi:
ऋषि : दीर्घतमा औचथ्यः | देवता : विश्वेदेवा: | छन्द : निचृत्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः
विषय : फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।
पदपाठ : कः। द॒द॒र्श॒। प्र॒थ॒मम्। जाय॑मानम्। अ॒स्थ॒न्ऽवन्त॑म्। यत्। अ॒न॒स्था। बिभ॑र्ति। भूम्याः॑। असुः॑। असृ॑क्। आ॒त्मा। क्व॑। स्वि॒त्। कः। वि॒द्वांस॑म्। उप॑। गा॒त्। प्रष्टु॑म्। ए॒तत् ॥ १.१६४.४
पदार्थ : (यत्) जिस (प्रथमम्) प्रख्यात प्रथम अर्थात् सृष्टि के पहले (जायमानम्) उत्पन्न होते हुए (अस्थन्वन्तम्) हड्डियों से युक्त देह को (भूम्याः) भूमि के बीच (अनस्था) हड्डियों से रहित (असुः) प्राण (असृक्) रुधिर और (आत्मा) जीव (बिभर्त्ति) धारण करता उसको (क्व, स्वित्) कहीं भी (कः) कौन (ददर्श) देखता है (कः) और कौन (एतत्) इस उक्त विषय के (प्रष्टुम्) पूछने को (विद्वांसम्) विद्वान् के (उप, गात्) समीप जावे ॥ ४ ॥
भावार्थ : जब सृष्टि के प्रारम्भ में ईश्वर ने सबके शरीर बनाये तब कोई जीव इनका देखने-वाला न हुआ। जब उनमें जीवात्मा प्रवेश किये तब प्राण आदि वायु, रुधिर आदि धातु और जीव भी मिलकर देह को धारण करते हुए और चेष्टा करते हुए, इत्यादि विषय की प्राप्ति के लिये विद्वान् को कोई ही पूछने को जाता है, किन्तु सब नहीं ॥ ४ ॥
In Sanskrit:
ऋषि : दीर्घतमा औचथ्यः | देवता : विश्वेदेवा: | छन्द : निचृत्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः
विषय : पुनस्तमेव विषयमाह ।
पदपाठ : कः। द॒द॒र्श॒। प्र॒थ॒मम्। जाय॑मानम्। अ॒स्थ॒न्ऽवन्त॑म्। यत्। अ॒न॒स्था। बिभ॑र्ति। भूम्याः॑। असुः॑। असृ॑क्। आ॒त्मा। क्व॑। स्वि॒त्। कः। वि॒द्वांस॑म्। उप॑। गा॒त्। प्रष्टु॑म्। ए॒तत् ॥ १.१६४.४
पदार्थ : (कः) (ददर्श) पश्यति (प्रथमम्) आदिमं प्रख्यातम् (जायमानम्) (अस्थन्वन्तम्) अस्थियुक्तं देहम् (यत्) यम् (अनस्था) अस्थिरहितः (बिभर्त्ति) धरति (भूम्याः) पृथिव्या मध्ये (असुः) प्राणः (असृक्) रुधिरम् (आत्मा) जीवः (क्व) कस्मिन् (स्वित्) अपि (कः) (विद्वांसम्) (उप) (गात्) गच्छेत्। अत्राडभावः। (प्रष्टुम्) (एतत्) ॥ ४ ॥
अन्वय : यद्यं प्रथमं सृष्टेः प्रागादिमं जायमानमस्थन्वन्तं देहम्भूम्या मध्येऽनस्थासुरसृगात्मा च बिभर्त्ति तं क्व स्वित् को ददर्श क एतत् प्रष्टुं विद्वांसमुपगात् ॥ ४ ॥
भावार्थ : यदा सृष्टेः प्रागीश्वरेण सर्वेषां शराराणि निर्मितानि तदा कोऽपि जीव एतेषां द्रष्टा नासीत्। यदा तेषु जीवात्मानः प्रवेशितास्तदा प्राणादयो वायवः रुधिरादयो धातवो जीवाश्च मिलित्वा देहं धरन्ति स्म जीवयन्ति स्म च इत्यादि प्राप्तये विद्वांसं कश्चिदेव प्रष्टुं याति न सर्वे ॥ ४ ॥