Rigveda / 1 / 164 / 6
अचि॑कित्वाञ्चिकि॒तुष॑श्चि॒दत्र॑ क॒वीन्पृ॑च्छामि वि॒द्मने॒ न वि॒द्वान्। वि यस्त॒स्तम्भ॒ षळि॒मा रजां॑स्य॒जस्य॑ रू॒पे किमपि॑ स्वि॒देक॑म् ॥
Veda : Rigveda | Mandal : 1 | Sukta : 164 | Mantra No : 6
In English:
Seer : diirghatamaa auchathyaH | Devta : vishvedevaa: | Metre : nichRRittriShTup | Tone : dhaivataH
Subject : English Translation Under Process
Verse : achikitvaa~nchikituShashchidatra kaviinpRRichChaami vidmane na vidvaan. vi yastastambha ShaLimaa rajaa.msyajasya ruupe kimapi svidekam .
Component Words : achikitvaan. chikituShaH. chit. atra. kaviin. pRRichChaami. vidmane. na. vidvaan. vi. yaH. tastambha. ShaT. imaa. rajaa.msi. ajasya. ruupe. kim. api. svit. ekam . 1.164.6
In Hindi:
ऋषि : दीर्घतमा औचथ्यः | देवता : विश्वेदेवा: | छन्द : निचृत्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः
विषय : फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।
पदपाठ : अचि॑कित्वान्। चि॒कि॒तुषः॑। चि॒त्। अत्र॑। क॒वीन्। पृ॒च्छा॒मि॒। वि॒द्मने॑। न। वि॒द्वान्। वि। यः। त॒स्तम्भ॑। षट्। इ॒मा। रजां॑सि। अ॒जस्य॑। रू॒पे। किम्। अपि॑। स्वि॒त्। एक॑म् ॥ १.१६४.६
पदार्थ : (अचिकित्वान्) अविद्वान् मैं (चित्) भी (अत्र) इस विद्याव्यवहार में (चिकितुषः) अज्ञानरूपी रोग के दूर करनेवाले (कवीन्) पूरी विद्यायुक्त आप्तविद्वानों को (विद्वान्) विद्यावान् (विद्मने) विशेष जानने के लिये (न) जैसे पूछे वैसे (पृच्छामि) पूछता हूँ, (यः) जो (षट्) छः (इमा) इन (रजांसि) पृथिवी आदि स्थूल तत्त्वों को (वि, तस्तम्भ) इकट्ठा करता है (अजस्य) प्रकृति अर्थात् जगत् के कारण वा जीव के (रूपे) रूप में (किम्) क्या (स्वित् अपि) ही (एकम्) एक हुआ है इसको तुम कहो ॥ ६ ॥
भावार्थ : इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जैसे अविद्वान् विद्वानों को पूछ के विद्वान् होते हैं, वैसे विद्वान् भी परम विद्वानों को पूछ कर विद्या की वृद्धि करें ॥ ६ ॥
In Sanskrit:
ऋषि : दीर्घतमा औचथ्यः | देवता : विश्वेदेवा: | छन्द : निचृत्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः
विषय : पुनस्तमेव विषयमाह ।
पदपाठ : अचि॑कित्वान्। चि॒कि॒तुषः॑। चि॒त्। अत्र॑। क॒वीन्। पृ॒च्छा॒मि॒। वि॒द्मने॑। न। वि॒द्वान्। वि। यः। त॒स्तम्भ॑। षट्। इ॒मा। रजां॑सि। अ॒जस्य॑। रू॒पे। किम्। अपि॑। स्वि॒त्। एक॑म् ॥ १.१६४.६
पदार्थ : (अचिकित्वान्) अविद्वान् (चिकितुषः) (चित्) अपि (अत्र) अस्मिन् विद्याव्यवहारे (कवीन्) पूर्णविद्यानाप्तान् (पृच्छामि) (विद्मने) विज्ञानाय (न) इव (विद्वान्) विद्यावान् (वि) (यः) (तस्तम्भ) स्तभ्नाति (षट्) (इमा) इमानि (रजांसि) पृथिव्यादीनि स्थूलानि तत्त्वानि (अजस्य) प्रकृतेर्जीवस्य वा (रूपे) (किम्) (अपि) (स्वित्) (एकम्) ॥ ६ ॥
अन्वय : अचिकित्वानहं चिदत्र चिकितुषः कवीन् विद्वान् विद्मने न पृच्छामि। यः षडिमा रजांसि वितस्तम्भ। अजस्य रूपे किं स्विदप्येकमासीत्तद्यूयं ब्रूत ॥ ६ ॥
भावार्थ : अत्रोपमालङ्कारः। यथा अविद्वांसो विदुषः पृष्ट्वा विद्वांसो भवन्ति तथा विद्वांसोऽपि परमविदुषः पृष्ट्वा विद्या वर्द्धयेयुः ॥ ६ ॥