Rigveda / 1 / 164 / 16
स्त्रिय॑: स॒तीस्ताँ उ॑ मे पुं॒स आ॑हु॒: पश्य॑दक्ष॒ण्वान्न वि चे॑तद॒न्धः। क॒विर्यः पु॒त्रः स ई॒मा चि॑केत॒ यस्ता वि॑जा॒नात्स पि॒तुष्पि॒तास॑त् ॥
Veda : Rigveda | Mandal : 1 | Sukta : 164 | Mantra No : 16
In English:
Seer : diirghatamaa auchathyaH | Devta : vishvedevaa: | Metre : triShTup | Tone : dhaivataH
Subject : English Translation Under Process
Verse : striyaH satiistaa.N u me pu.msa aahuH pashyadakShaNvaanna vi chetadandhaH. kaviryaH putraH sa iimaa chiketa yastaa vijaanaatsa pituShpitaasat .
Component Words : striyaH. satiiH. taan. uu.N iti. me. pu.msaH. aaaahuH. pashyat. akShaN.avaan. na. vi. chetat. andhaH. kaviH. yaH. putraH. saH. iim. aa. chiketa. yaH. taa. vi.ajaanaat. saH. pituH. pitaa. asat . 1.164.16
In Hindi:
ऋषि : दीर्घतमा औचथ्यः | देवता : विश्वेदेवा: | छन्द : त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः
विषय : अब विद्वान् और विदुषी स्त्रियों के विषय को कहते हैं ।
पदपाठ : स्त्रियः॑। स॒तीः। तान्। ऊँ॒ इति॑। मे॒। पुं॒सः। आ॑आ॒हुः॒। पश्य॑त्। अ॒क्ष॒ण्ऽवान्। न। वि। चे॒त॒त्। अ॒न्धः। क॒विः। यः। पु॒त्रः। सः। ई॒म्। आ। चि॒के॒त॒। यः। ता। वि॒ऽजा॒नात्। सः। पि॒तुः। पि॒ता। अ॒स॒त् ॥ १.१६४.१६
पदार्थ : हे मनुष्यो ! जिनको (अक्षण्वान्) विज्ञानवान् पुरुष (पश्यत्) देखे (अन्धः) और अन्ध अर्थात् अज्ञानी पुरुष (न) नहीं (वि, चेतत्) विविध प्रकार से जाने और जिनको (सतीः) विद्या तथा उत्तम शिक्षादि शुभ गुणों से युक्त (स्त्रियः) स्त्रियाँ (आहुः) कहती हैं (तानु) उन्हीं (मे) मेरे (पुंसः) पुरुषों को जानो (यः) जो (कविः) विक्रमण करने अर्थात् प्रत्येक पदार्थ में क्रम-क्रम से पहुँचानेवाली बुद्धि रखनेवाला (पुत्रः) पवित्र वृद्धि को प्राप्त पुरुष (ता) उन इष्ट पदार्थों को (ईम्) सब ओर से (आ, विजानात्) अच्छे प्रकार जाने (सः) वह विद्वान् हो और (यः) जो विद्वान् हो (सः) वह (पितुः) पिता का (पिता) पिता (असत्) हो यह तुम (चिकेत) जानो ॥ १६ ॥
भावार्थ : जिसको विद्वान् जानते हैं उसको अविद्वान् नहीं जान सकते, जैसे विद्वान् जन पुत्रों को पढ़ाकर विद्वान् करें वैसे विदुषी स्त्रियाँ कन्याओं को विदुषी करें। जो पृथिवी से लेके ईश्वरपर्यन्त पदार्थों के गुण, कर्म, स्वभावों को जान, धर्म्म, अर्थ, काम और मोक्ष को सिद्ध करते हैं, वे ज्वान भी बुड्ढों के पिता होते हैं ॥ १६ ॥
In Sanskrit:
ऋषि : दीर्घतमा औचथ्यः | देवता : विश्वेदेवा: | छन्द : त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः
विषय : अथ विद्वद्विदुषीविषयमाह ।
पदपाठ : स्त्रियः॑। स॒तीः। तान्। ऊँ॒ इति॑। मे॒। पुं॒सः। आ॑आ॒हुः॒। पश्य॑त्। अ॒क्ष॒ण्ऽवान्। न। वि। चे॒त॒त्। अ॒न्धः। क॒विः। यः। पु॒त्रः। सः। ई॒म्। आ। चि॒के॒त॒। यः। ता। वि॒ऽजा॒नात्। सः। पि॒तुः। पि॒ता। अ॒स॒त् ॥ १.१६४.१६
पदार्थ : (स्त्रियः) (सतीः) विद्यासुशिक्षादिशुभगुणसहिताः (तान्) (उ) वितर्के (मे) मम (पुंसः) पुरुषान् (आहुः) कथयन्ति (पश्यत्) पश्येत्। अत्र लङ्यडभावः। (अक्षण्वान्) विज्ञानी (न) निषेधे (वि) (चेतत्) चेतेत् (अन्धः) ज्ञानशून्यः (कविः) विक्रान्तप्रज्ञः (यः) (पुत्रः) पवित्रोपचितः (सः) (ईम्) (आ) (चिकेत) विजानीत (यः) (ता) तानि (विजानात्) (सः) (पितुः) जनकस्य (पिता) जनकः (असत्) भवेत् ॥ १६ ॥
अन्वय : हे मनुष्या यान् अक्षण्वान् पश्यदन्धो न विचेतत् सतीः स्त्रिय आहुस्तानु मे पुंसो जनान् विजानीत। यः कविः पुत्रस्ता तानीमा विजानात् स विद्वान् स्यात् यो विद्वान् भवेत् स पितुष्पितासदिति यूयं चिकेत ॥ १६ ॥
भावार्थ : यद्विद्वांसो जानन्ति तदविद्वांसो ज्ञातुं न शक्नुवन्ति। यथा विद्वांसः पुत्रानध्याप्य विदुषः कुर्य्युस्तथा विदुष्यः स्त्रियः कन्या विदुषीः संपादयेयुः। ये पृथिवीमारभ्य परमेश्वरपर्यन्तानां पदार्थानां गुणकर्मस्वभावान् विज्ञाय धर्म्मार्थकाममोक्षान् साध्नुवन्ति ते युवानोऽपि वृद्धानां पितरो भवन्ति ॥ १६ ॥