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Rigveda / 1 / 164 / 23

यद्गा॑य॒त्रे अधि॑ गाय॒त्रमाहि॑तं॒ त्रैष्टु॑भाद्वा॒ त्रैष्टु॑भं नि॒रत॑क्षत। यद्वा॒ जग॒ज्जग॒त्याहि॑तं प॒दं य इत्तद्वि॒दुस्ते अ॑मृत॒त्वमा॑नशुः ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 1 | Sukta : 164 | Mantra No : 23

In Hindi:

ऋषि : दीर्घतमा औचथ्यः | देवता : विश्वेदेवा: | छन्द : जगती | स्वर : निषादः

विषय : फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।

पदपाठ : यत्। गा॒य॒त्रे। अधि॑। गा॒य॒त्रम्। आऽहि॑त॑म्। त्रैस्तु॑भात्। वा॒। त्रैस्तु॑भम्। निः॒ऽअत॑क्षत। यत्। वा॒। जग॑त्। जग॑ति। आऽहि॑तम्। प॒दम्। ये। इत्। तत्। वि॒दुः। ते। अ॒मृ॒त॒ऽत्वम्। आ॒न॒शुः॒ ॥ १.१६४.२३

पदार्थ : (ये) जो लोग (यत्) जो (गायत्रे) गायत्रीछन्दोवाच्य वृत्ति में (गायत्रम्) गानेवालों की रक्षा करनेवाला (अधि, आहितम्) स्थित है (त्रैष्टुभात्, वा) अथवा त्रिष्टुप् छन्दोवाच्य वृत्त से (त्रैष्टुभम्) त्रिष्टुप् में प्रसिद्ध हुए अर्थ को (निरतक्षत) निरन्तर विस्तारते हैं (वा) वा (यत्) जो (जगति) संसार में (जगत्) प्राणि आदि जगत् (पदम्) जानने योग्य (आहितम्) स्थित है (तत्) उसको (विदुः) जानते हैं (ते) वे (इत्) ही (अमृतत्वम्) मोक्षभाव को (आनशुः) प्राप्त होते हैं ॥ २३ ॥

भावार्थ : जो सृष्टि के पदार्थ और तत्रस्थ ईश्वरकृत रचना को जानकर परमात्मा का सब ओर से ध्यान कर विद्या और धर्म की उन्नति करते हैं, वे मोक्ष पाते हैं ॥ २३ ॥