Donation Appeal Download Our App
Choose Mantra
Rigveda / 1 / 164 / 29

अ॒यं स शि॑ङ्क्ते॒ येन॒ गौर॒भीवृ॑ता॒ मिमा॑ति मा॒युं ध्व॒सना॒वधि॑ श्रि॒ता। सा चि॒त्तिभि॒र्नि हि च॒कार॒ मर्त्यं॑ वि॒द्युद्भव॑न्ती॒ प्रति॑ व॒व्रिमौ॑हत ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 1 | Sukta : 164 | Mantra No : 29

In Hindi:

ऋषि : दीर्घतमा औचथ्यः | देवता : विश्वेदेवा: | छन्द : निचृज्जगती | स्वर : निषादः

विषय : फिर भूमि के विषय में कहा है ।

पदपाठ : अयम्। सः। शि॒ङ्क्ते॒। येन॑। गौः। अ॒भिऽवृ॑ता। मिमा॑ति। मा॒युम्। ध्व॒सनौ॑। अधि॑। श्रि॒ता। सा। चि॒त्तिऽभिः॑। नि। हि। च॒कार॑। मर्त्य॑म्। वि॒ऽद्युत्। भव॑न्ती। प्रति॑। व॒व्रिम्। औ॒ह॒त॒ ॥ १.१६४.२९

पदार्थ : (सः) सो (अयम्) यह बछड़े के समान मेघ भूमि को लख (शिङ्क्ते) गर्जन का अव्यक्त शब्द करता है कौन कि (येन) जिससे (ध्वसनौ) ऊपर, नीचे और बीच में जाने को परकोटा उसमें (अधि, श्रिता) धरी हुई (अभीवृता) सब ओर पवन से आवृत (गौः) पृथिवी (मायुम्) परिमित मार्ग को (प्रति, मिमाति) प्रति जाती है (सा) वह (चित्तिभिः) परमाणुओं के समूहों से (मर्त्यम्) मरणधर्मा मनुष्य को (चकार) करती है उस पृथिवी (हि) ही में (भवन्ती) वर्त्तमान (विद्युत्) बिजुली (वव्रिम्) अपने रूप को (नि, औहत) निरन्तर तर्क-वितर्क से प्राप्त होती है ॥ २९ ॥

भावार्थ : जैसे पृथिवी से उत्पन्न हो उठकर अन्तरिक्ष में बढ़ फैल मेघ पृथिवी में वृक्षादि को अच्छे सींच उनको बढ़ाता है, वैसे पृथिवी सबको बढ़ाती है और पृथिवी में जो बिजुली है वह रूप को प्रकाशित करती। जैसे शिल्पी जन क्रम से किसी पदार्थ के इकट्ठा करने और विज्ञान से घर आदि बनाता है, वैसे परमेश्वर ने यह सृष्टि बनाई है ॥ २९ ॥