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Rigveda / 9 / 4 / 5

त्वं सूर्ये॑ न॒ आ भ॑ज॒ तव॒ क्रत्वा॒ तवो॒तिभि॑: । अथा॑ नो॒ वस्य॑सस्कृधि ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 9 | Sukta : 4 | Mantra No : 5

In Hindi:

ऋषि : हिरण्यस्तूपः | देवता : पवमानः सोमः | छन्द : निचृद्गायत्री | स्वर : षड्जः

विषय :

पदपाठ : त्वम् । सूर्ये॑ । नः॒ । आ । भ॒ज॒ । तव॑ । क्रत्वा॑ । तव॑ । ऊ॒तिऽभिः॑ । अथ॑ । नः॒ । वस्य॑सः । कृ॒धि॒ ॥ ९.४.५

पदार्थ : हे परमात्मन् ! तुम (नः) हमको (सूर्ये) ज्ञान प्रदान के लिये (आभज) आकर प्राप्त हो। (क्रत्वा) यज्ञों द्वारा (अथ तव ऊतिभिः) और अपनी रक्षा द्वारा (नः) हमको (वस्यसस्कृधि) सुखी बनाओ ॥५॥

भावार्थ : हे परमात्मन् ! आप ज्ञान और कर्म द्वारा हमारी सर्वदा रक्षा करें और ऐहिक तथा पारलौकिक सुख से हमको सदैव सम्पन्न करें ॥५॥२२॥