Rigveda / 9 / 7 / 2
प्र धारा॒ मध्वो॑ अग्रि॒यो म॒हीर॒पो वि गा॑हते । ह॒विर्ह॒विष्षु॒ वन्द्य॑: ॥
Veda : Rigveda | Mandal : 9 | Sukta : 7 | Mantra No : 2
In English:
Seer : asitaH kaashyapo devalo vaa | Devta : pavamaanaH somaH | Metre : nichRRidgaayatrii | Tone : ShaDjaH
Subject : English Translation will be uploaded as and when ready
Verse : pra dhaaraa madhvo agriyo mahiirapo vi gaahate . havirhaviShShu vandyaH .
Component Words : pra . dhaaraa . madhvaH . agriyaH . mahiiH . apaH . vi . gaahate . haviH . haviShShu . vandyaH . 9.7.2
In Hindi:
ऋषि : असितः काश्यपो देवलो वा | देवता : पवमानः सोमः | छन्द : निचृद्गायत्री | स्वर : षड्जः
विषय :
पदपाठ : प्र । धारा॑ । मध्वः॑ । अ॒ग्रि॒यः । म॒हीः । अ॒पः । वि । गा॒ह॒ते॒ । ह॒विः । ह॒विष्षु॑ । वन्द्यः॑ ॥ ९.७.२
पदार्थ : (हविष्षु) 'हूयते गृह्यत इति हविः’ सम्पूर्ण ग्रहणयोग्य पदार्थों में से जो (हविः) सर्वोपरि ग्राह्य है और (वन्द्यः) सम्पूर्ण विश्व से वन्दनीय है, वह (अग्रियः) अग्रणी परमात्मा (मध्वः धाराः) मीठी धाराओं से (महीः) पृथिवीलोक तथा (अपः) द्युलोक को (विगाहते) अवगाहन करता है ॥२॥
भावार्थ : सर्वजनवन्दनीय परमात्मा लोक-लोकान्तरों में सर्वत्र ही अपने मधुर आनन्द की वृष्टि करता है ॥२॥
In Sanskrit:
ऋषि : असितः काश्यपो देवलो वा | देवता : पवमानः सोमः | छन्द : निचृद्गायत्री | स्वर : षड्जः
पदपाठ : प्र । धारा॑ । मध्वः॑ । अ॒ग्रि॒यः । म॒हीः । अ॒पः । वि । गा॒ह॒ते॒ । ह॒विः । ह॒विष्षु॑ । वन्द्यः॑ ॥ ९.७.२
भावार्थ :