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Rigveda / 9 / 10 / 9

अ॒भि प्रि॒या दि॒वस्प॒दम॑ध्व॒र्युभि॒र्गुहा॑ हि॒तम् । सूर॑: पश्यति॒ चक्ष॑सा ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 9 | Sukta : 10 | Mantra No : 9

In Hindi:

ऋषि : असितः काश्यपो देवलो वा | देवता : पवमानः सोमः | छन्द : गायत्री | स्वर : षड्जः

विषय :

पदपाठ : अ॒भि । प्रि॒या । दि॒वः । प॒दम् । अ॒ध्व॒र्युऽभिः॑ । गुहा॑ । हि॒तम् । सूरः॑ । प॒श्य॒ति॒ । चक्ष॑सा ॥ ९.१०.९

पदार्थ : (सूरः) “सरति ज्ञानद्वारेण सर्वत्र प्राप्नोतीति सूरो विद्वान्” विद्वान् (अभि, प्रिया) जो सब का प्यारा है, वह (अध्वर्युभिः) अध्वर्यु आदि ऋत्विजों से जो (गुहा, हितम्) यज्ञरूपी गुहा में निहित है और (दिवस्पदम्) जो द्युलोक का भी आधिकरणरूपी पद है, उसको (चक्षसा) ज्ञानदृष्टि से (पश्यति) देखता है ॥९॥

भावार्थ : जो इस संसाररूपी गुहा में स्थिर सूक्ष्म से अति सूक्ष्म परमात्मा है और जो भ्वादि लोकों का एकमात्र अधिकरण है, उस को आत्मज्ञानी विद्वान् ही जान सकते हैं, अन्य नहीं ॥९॥३५॥ यह दशवाँ सूक्त और पैतीसवाँ वर्ग समाप्त हुआ ॥