Rigveda / 9 / 11 / 5
हस्त॑च्युतेभि॒रद्रि॑भिः सु॒तं सोमं॑ पुनीतन । मधा॒वा धा॑वता॒ मधु॑ ॥
Veda : Rigveda | Mandal : 9 | Sukta : 11 | Mantra No : 5
In English:
Seer : asitaH kaashyapo devalo vaa | Devta : pavamaanaH somaH | Metre : gaayatrii | Tone : ShaDjaH
Subject : English Translation will be uploaded as and when ready
Verse : hastachyutebhiradribhiH suta.m soma.m puniitana . madhaavaa dhaavataa madhu .
Component Words : hasta.achyutebhiH . adri.abhiH . sutam . somam . puniitana . madhau . aa . dhaavata . madhu . 9.11.5
In Hindi:
ऋषि : असितः काश्यपो देवलो वा | देवता : पवमानः सोमः | छन्द : गायत्री | स्वर : षड्जः
विषय :
पदपाठ : हस्त॑ऽच्युतेभिः । अद्रि॑ऽभिः । सु॒तम् । सोम॑म् । पु॒नी॒त॒न॒ । मधौ॑ । आ । धा॒व॒त॒ । मधु॑ ॥ ९.११.५
पदार्थ : हे परमात्मन् ! आप (हस्तच्युतेभिः अद्रिभिः) वाणीरूप वज्र से (सुतम्) कूट २ कर (सोमम्) मेरे स्वभाव को (पुनीतन) पवित्र करें ताकि (मधौ) आप के मधुर स्वरूप में (मधु) मीठा बन कर (आधावत) लगे ॥५॥
भावार्थ : परमात्मा का वाग्रूपी वज्र जिस पुरुष की अविद्या की लता को काटता है, वह पुरुष सरलप्रकृति बन कर परमात्मा के आनन्दमय स्वरूप में निमग्न होता है ॥५॥
In Sanskrit:
ऋषि : असितः काश्यपो देवलो वा | देवता : पवमानः सोमः | छन्द : गायत्री | स्वर : षड्जः
पदपाठ : हस्त॑ऽच्युतेभिः । अद्रि॑ऽभिः । सु॒तम् । सोम॑म् । पु॒नी॒त॒न॒ । मधौ॑ । आ । धा॒व॒त॒ । मधु॑ ॥ ९.११.५
भावार्थ :