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Rigveda / 9 / 42 / 2

ए॒ष प्र॒त्नेन॒ मन्म॑ना दे॒वो दे॒वेभ्य॒स्परि॑ । धार॑या पवते सु॒तः ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 9 | Sukta : 42 | Mantra No : 2

In Hindi:

ऋषि : मेध्यातिथिः | देवता : पवमानः सोमः | छन्द : निचृद्गायत्री | स्वर : षड्जः

विषय :

पदपाठ : ए॒षः । प्र॒त्नेन॑ । मन्म॑ना । दे॒वः । दे॒वेभ्यः॑ । परि॑ । धार॑या । प॒व॒ते॒ । सु॒तः ॥ ९.४२.२

पदार्थ : (प्रत्नेन मन्मना) प्राचीन वेदरूप स्तोत्र से (देवः) प्रकाशमान (एषः सुतः) यह स्वयंसिद्ध परमात्मा (देवेभ्यः) दिव्यगुणसम्पन्न विद्वानों को (धारया) आनन्द की धारा से (परि पवते) भली प्रकार आह्लादित करता है ॥२॥

भावार्थ : परमात्मा अपने वैदिक ज्ञान से सब लोगों को ज्ञानी-विज्ञानी बनाकर आनन्दित करता है ॥२॥