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Rigveda / 9 / 48 / 5

अधा॑ हिन्वा॒न इ॑न्द्रि॒यं ज्यायो॑ महि॒त्वमा॑नशे । अ॒भि॒ष्टि॒कृद्विच॑र्षणिः ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 9 | Sukta : 48 | Mantra No : 5

In Hindi:

ऋषि : कविभार्गवः | देवता : पवमानः सोमः | छन्द : गायत्री | स्वर : षड्जः

विषय :

पदपाठ : अध॑ । हि॒न्वा॒नः । इ॒न्द्रि॒यम् । ज्यायः॑ । म॒हि॒ऽत्वम् । आ॒न॒शे॒ । अ॒भि॒ष्टि॒ऽकृत् । विऽच॑र्षणिः ॥ ९.४८.५

पदार्थ : (अधा) आप (इन्द्रियं हिन्वानः) इन्द्रिय के प्रेरक हैं (ज्यायः) सर्वोपरि विराजमान होने से (महित्वमानशे) अपनी महिमा से सर्वत्र व्याप्त हो रहे हैं (अभिष्टिकृत्) तथा अपने भक्तों के लिये कामनाओं के प्रदाता हैं (विचर्षणिः) सबके कर्मों के द्रष्टा हैं ॥५॥

भावार्थ : जीवों के अन्दर अन्तर्यामी रूप से व्याप्त एकमात्र परमात्मा ही है, कोई अन्य देव नहीं ॥५॥ यह ४८ वाँ सूक्त और ५ वाँ वर्ग समाप्त हुआ ॥