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Rigveda / 9 / 54 / 4

परि॑ णो दे॒ववी॑तये॒ वाजाँ॑ अर्षसि॒ गोम॑तः । पु॒ना॒न इ॑न्दविन्द्र॒युः ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 9 | Sukta : 54 | Mantra No : 4

In Hindi:

ऋषि : अवत्सारः | देवता : पवमानः सोमः | छन्द : गायत्री | स्वर : षड्जः

विषय :

पदपाठ : परि॑ । नः॒ । दे॒वऽवी॑तये । वाजा॑न् । अ॒र्ष॒सि॒ । गोऽम॑तः । पु॒ना॒नः । इ॒न्दो॒ इति॑ । इ॒न्द्र॒ऽयुः ॥ ९.५४.४

पदार्थ : (इन्दो) हे परमात्मन् ! (नः) हमको (परि पुनानः) सब ओर से पवित्र करते हुए आप (देववीतये) देवों की तृप्ति के लिये (गोमतः वाजान्) गवादि ऐश्वर्य को (अर्षसि) देते हैं (इन्द्रयुः) क्योंकि आप देवों अर्थात् दिव्यगुणसम्पन्न सत्कर्म्मियों को चाहनेवाले हैं ॥४॥

भावार्थ : परमात्मा की कृपा से ही मनुष्य को दिव्य शक्तियें मिलती हैं। परमात्मा ही अपनी अपार दया से मनुष्य को देवभाव प्रदान करता है। हे देवत्व के अभिलाषी जनों ! आपको चाहिये कि आप सदैव उस दिव्यगुण परमात्मा की उपासना करते रहें ॥४॥ यह ५४ वाँ सूक्त और ११ वाँ वर्ग समाप्त हुआ ॥