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Rigveda / 9 / 58 / 3

ध्व॒स्रयो॑: पुरु॒षन्त्यो॒रा स॒हस्रा॑णि दद्महे । तर॒त्स म॒न्दी धा॑वति ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 9 | Sukta : 58 | Mantra No : 3

In Hindi:

ऋषि : अवत्सारः | देवता : पवमानः सोमः | छन्द : निचृद्गायत्री | स्वर : षड्जः

विषय :

पदपाठ : ध्व॒स्रयोः॑ । पु॒रु॒ऽसन्त्योः॑ । आ । स॒हस्रा॑णि । द॒द्म॒हे॒ । तर॑त् । सः । म॒न्दी । धा॒व॒ति॒ ॥ ९.५८.३

पदार्थ : हे परमात्मन् ! (ध्वस्रयोः पुरुषन्त्योः) आपकी व्याप्तिशील जो ज्ञानशक्ति और कर्मशक्ति (सहस्राणि) अनेक प्रकार की हैं, उनको (आदद्महे) हम प्राप्त करें (तरत् स मन्दी धावति) आप सबको तारते हुए हर्षरूप से सर्वत्र विराजित हैं ॥३॥

भावार्थ : परमात्मा की ज्ञानशक्ति और कर्मशक्ति का लाभ करके कर्मयोगी और ज्ञानयोगी अपने कर्तव्य में तत्पर रहते हैं ॥३॥