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Rigveda / 9 / 61 / 2

पुर॑: स॒द्य इ॒त्थाधि॑ये॒ दिवो॑दासाय॒ शम्ब॑रम् । अध॒ त्यं तु॒र्वशं॒ यदु॑म् ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 9 | Sukta : 61 | Mantra No : 2

In Hindi:

ऋषि : अमहीयुः | देवता : पवमानः सोमः | छन्द : गायत्री | स्वर : षड्जः

विषय :

पदपाठ : पुरः॑ । स॒द्यः । इ॒थाऽधि॑ये । दिवः॑ऽदासाय । शम्ब॑रम् । अध॑ । त्यम् । तु॒र्वश॑म् । यदु॑म् ॥ ९.६१.२

पदार्थ : हे कर्मयोगिन् ! जो (इत्थाधिये दिवोदासाय) सत्य बुद्धिवाले और द्युलोक सम्बन्धी कर्मों में कुशल आपके (शम्बरम्) शत्रु हैं (त्यम् तुर्वशम् यदुम्) इस हिंसक मनुष्य को (अध) और उसके (पुरः) पुर को ध्वंसन करो ॥२॥

भावार्थ : कर्म्मयोगी लोग शत्रुओं के पुरों को सर्वप्रकार से भेदन कर सकते हैं, अन्य नहीं ॥२॥